महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1594, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदाब्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरंदरः ॥ १०४ ॥ शत्रुओंका नाश करके जब कुमार कार्तिकेय भगवान् महेश्वरके पास पहुँचे, उस समय इन्द्रने उनको हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥ १०४ ॥
ब्रह्मदत्तवरः स्कन्द त्वयायं महिषो हतः । देवास्तृणसमा यस्य बभूवुर्जयतां वर ॥ १०५ ॥ सोऽयं त्वया महाबाहो शमितो देवकण्टकः । शतं महिषतुल्यानां दानवानां त्वया रणे ॥ १०६ ॥ निहतं देवशत्रूणां यैर्वयं पूर्वतापिताः । तावकैर्भक्षिताश्चान्ये दानवाः शतसङ्घशः ॥ १०७ ॥ ‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ स्कन्द! इस महिषासुरको ब्रह्माजीने वरदान दिया था, जिसके कारण इसके सामने सब देवता तिनकोंके समान हो गये थे। आज तुमने इसे मार गिराया है। महाबाहो! यह देवताओंके लिये बड़ा भारी काँटा था, जिसे तुमने निकाल फेंका है। यही नहीं, आज रणभूमिमें इस महिषके समान पराक्रमी एक सौ देवद्रोही दानव और तुम्हारे हाथसे मारे गये हैं, जो पहले हमें बहुत कष्ट दे चुके हैं। तुम्हारे पार्षद भी सैकड़ों दानवोंको खा गये हैं ॥ १०५—१०७ ॥
अजेयस्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः । एतत् ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति ॥ १०८ ॥ त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय्या भविष्यति । वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव महाभुज ॥ १०९ ॥ ‘देव! तुम भगवान् शंकरके समान ही युद्धमें शत्रुओंके लिये अजेय हो। यह तुम्हारा प्रथम पराक्रम सर्वत्र विख्यात होगा। तुम्हारी अक्षय कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल जायगी। महाबाहो! सब देवता तुम्हारे वशमें रहेंगे’ ॥
एवमुक्त्वा महासेनं निवृत्तः सह दैवतैः । अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्बकेण शचीपतिः ॥ ११० ॥ महासेनसे ऐसा कहकर शचीपति इन्द्र भगवान् शंकरकी आज्ञा ले देवताओंके साथ स्वर्गलोकको लौट गये ॥
गतो भद्रवटं रुद्रो निवृत्ताश्च दिवौकसः । उक्ताश्च देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव ॥ १११ ॥ भगवान् रुद्र भद्रवटके समीप गये और देवता अपने-अपने स्थानको लौटने लगे। उस समय भगवान् शंकरने देवताओंसे कहा—‘तुम सब लोग कुमार कार्तिकेयको मेरे ही समान मानना’ ॥ १११ ॥
स हत्वा दानवगणान् पूज्यमानो महर्षिभिः । एकाह्नैवाजयत् सर्वं त्रैलोक्य वह्निन्दनः ॥ ११२ ॥