भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1598

प्रभुर्विभुश्चाप्यथ शत्रुजेता । सहस्रभूस्त्वं धरणी त्वमेव सहस्रतुष्टिश्च सहस्रभुक् च ॥ १४ ॥ आप ही सेनापति, अत्यन्त कोपवान्, प्रभु, विभु और शत्रुविजयी हैं। आप ही सहस्रभू और पृथ्वी हैं। आप ही सहस्रों प्राणियोंको संतोष देनेवाले तथा सहस्रभोक्ता हैं ॥ १४ ॥

सहस्रशीर्षस्त्वमनन्तरूपः सहस्रपात् त्वं गुह शक्तिधारी । गङ्गासुतस्त्वं स्वमतेन देव स्वाहामहीकृत्तिकानां तथैव ॥ १५ ॥ आपके सहस्रों मस्तक हैं। आपके रूपका कहीं अन्त नहीं है। आपके सहस्रों चरण हैं। गुह! आप शक्ति धारण करते हैं। देव! आप अपने इच्छानुसार गंगा, स्वाहा, पृथ्वी तथा कृत्तिकाओंके पुत्ररूपसे प्रकट हुए हैं ॥ १५ ॥

त्वं क्रीडसे षण्मुख कुक्कुटेन यथेष्टनानाविधकामरूपी । दीक्षासि सोमो मरुतः सदैव धर्मोऽसि वायुरचलेन्द्र इन्द्रः ॥ १६ ॥ षडानन! आप मुर्गेसे खेलते हैं तथा इच्छानुसार नाना प्रकारके कमनीय रूप धारण करते हैं। आप सदा ही दीक्षा, सोम, मरुद्गण, धर्म, वायु, गिरिराज तथा इन्द्र हैं ॥ १६ ॥

सनातनानामपि शाश्वतस्त्वं प्रभुः प्रभूणामपि चोग्रधन्वा । ऋतस्य कर्ता दितिजान्तकस्त्वं जेता रिपूणां प्रवरः सुराणाम् ॥ १७ ॥ आप सनातनोंमें भी सनातन हैं। प्रभुओंके भी प्रभु हैं। आपका धनुष भयंकर है। आप सत्यके प्रवर्तक, दैत्योंका संहार करनेवाले, शत्रुविजयी तथा देवताओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ १७ ॥

सूक्ष्मं तपस्तत् परमं त्वमेव परावरज्ञोऽसि परावरस्त्वम् । धर्मस्य कामस्य परस्य चैव त्वत्तेजसा कृत्स्नमिदं महात्मन् ॥ १८ ॥ जो सर्वोत्कृष्ट सूक्ष्म तप है, वह आप ही हैं। आप ही कार्य-कारण-तत्त्वके ज्ञाता तथा कार्यकारणस्वरूप हैं। धर्म, काम तथा इन दोनोंसे परे जो मोक्षतत्त्व है, उसके भी आप ही ज्ञाता हैं। महात्मन्! यह सम्पूर्ण जगत् आपके तेजसे प्रकाशित होता है ॥ १८ ॥

व्याप्तं जगत् सर्वसुरप्रवीर शक्त्या मया संस्तुत लोकनाथ ।