भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1612, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1612

तथाऽऽसनैश्चारुभिरग्रमाल्यै- दाक्षिण्ययोगैर्विविधैश्च गन्धैः । अस्याः प्रियोऽस्मीति यथा विदित्वा त्वामेव संश्लिष्यति तद् विधत्स्व ॥ ५ ॥

सखी! इस जगत्में कभी सुखके द्वारा सुख नहीं मिलता। पतिव्रता स्त्री दुःख उठाकर ही सुख पाती है। तुम सौहार्द, प्रेम, सुन्दर वेश-भूषा-धारण, सुन्दर आसन-समर्पण, मनोहर पुष्पमाला, उदारता, सुगन्धित द्रव्य एवं व्यवहारकुशलतासे श्यामसुन्दरकी निरन्तर आराधना करती रहो। उनके साथ ऐसा बर्ताव करो, जिससे वे यह समझकर 'कि सत्यभामाको मैं ही अधिक प्रिय हूँ' तुम्हें ही हृदयसे लगाया करें ॥ ४-५ ॥

श्रुत्वा स्वरं द्वारगतस्य भर्तुः प्रत्युत्थिता तिष्ठ गृहस्य मध्ये । दृष्ट्वा प्रविष्टं त्वरिताऽऽसनेन पाद्येन चैनं प्रतिपूजयस्व ॥ ६ ॥

जब महलके द्वारपर पधारे हुए प्राणवल्लभका स्वर सुनायी पड़े, तब तुम उठकर घरके आँगनमें आ जाओ और उनकी प्रतीक्षामें खड़ी रहो। जब देखो कि वे भीतर आ गये, तब तुरंत आसन और पाद्यके द्वारा उनका यथावत् पूजन करो ॥ ६ ॥

सम्प्रेषितायामथ चैव दास्या- मुत्थाय सर्वं स्वयमेव कार्यम् । जानातु कृष्णस्तव भावमेतं सर्वात्मना मां भजतीति सत्ये ॥ ७ ॥

सत्ये! यदि श्यामसुन्दर किसी कार्यके लिये दासीको भेजते हों तो तुम्हें स्वयं उठकर वह सब काम कर लेना चाहिये; जिससे श्रीकृष्णको तुम्हारे इस सेवा-भावका अनुभव हो जाय कि सत्यभामा सम्पूर्ण हृदयसे मेरी सेवा करती है ॥ ७ ॥

त्वत्संनिधौ यत् कथयेत् पतिस्ते यद्यप्यगुह्यं परिरक्षितव्यम् । काचित् सपत्नी तव वासुदेवं प्रत्यादिशेत् तेन भवेद् विरागः ॥ ८ ॥

तुम्हारे पति तुम्हारे निकट जो भी बात कहें, वह छिपानेयोग्य न हो, तो भी तुम्हें उसे गुप्त ही रखना चाहिये। अन्यथा तुम्हारे मुखसे उस बातको सुनकर यदि कोई सौत उसे श्यामसुन्दरके सामने कह दे, तो इससे उनके मनमें तुम्हारी ओरसे विरक्ति हो सकती है ॥ ८ ॥

प्रियांश्च रक्तांश्च हितांश्च भर्तु- स्तान् भोजयेथा विविधैरुपायैः ।