भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1620, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1620

कृष्णां परिक्लेशगुणेन युक्ताम् ॥ ६ ॥ उसने बताया—‘इस समय पाण्डव हवा और गर्मी आदिका कष्ट सहन करनेके कारण अत्यन्त कृश हो गये हैं। भयंकर दुःखके मुँहमें पड़ गये हैं और वीरपत्नी द्रौपदी भी अनाथकी भाँति सब ओरसे क्लेश-ही-क्लेश भोग रही है’ ॥ ६ ॥

ततः कथास्तस्य निशम्य राजा वैचित्रवीर्यः कृपयाभितप्तः । वने तथा पार्थिवपुत्रपौत्रान् श्रुत्वा तथा दुःखनदीं प्रपन्नान् ॥ ७ ॥ प्रोवाच दैन्याभिहतान्तरात्मा निःश्वासवातोपहतस्तदानीम् । वाचं कथंचित् स्थिरतामुपेत्य तत् सर्वमात्मप्रभवं विचिन्त्य ॥ ८ ॥ ब्राह्मणकी ये बातें सुनकर विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्र दयासे द्रवित हो बहुत दुःखी हो गये। जब उन्होंने सुना कि राजाके पुत्र और पौत्र होकर भी पाण्डव इस प्रकार दुःखकी नदीमें डूबे हुए हैं, तब उनका हृदय करुणासे भर आया और वे लंबी-लंबी साँसे खींचते हुए किसी प्रकार धैर्य धारण करके सब कुछ अपनी ही करतूतका परिणाम समझकर यों बोले — ॥ ७-८ ॥

कथं नु सत्यः शुचिरार्यवृत्तो ज्येष्ठः सुतानां मम धर्मराजः । अजातशत्रुः पृथिवीतले स्म शेते पुरा राङ्कवकूटशायी ॥ ९ ॥ ‘अहो! जो मेरे सभी पुत्रोंमें बड़े तथा सत्यवादी, पवित्र और सदाचारी हैं तथा जो पहले रंकु मृगके (नरम) रोओंसे बने हुए बिछौनोंपर सोया करते थे, वे अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर आजकल भूमिपर कैसे शयन करते होंगे? ॥ ९ ॥

प्रबोध्यते मागधसूतपूगै- र्नित्यं स्तुवद्भिः स्वयमिन्द्रकल्पः । पतत्रिसङ्घैः स जघन्यरात्रे प्रबोध्यते नूनमिडातलस्थः ॥ १० ॥ ‘जिन्हें कभी मागधों और सूतोंका समुदाय प्रतिदिन स्तुति-पाठ करके जगाता था, जो साक्षात् इन्द्रके समान तेजस्वी और पराक्रमी हैं, वे ही राजा युधिष्ठिर निश्चय ही अब भूमिपर सोते और पक्षियोंके कलरव सुनकर रातके पिछले पहरमें जागते होंगे’ ॥ १० ॥

कथं नु वातातपकर्शिताङ्गो वृकोदरः कोपपरिप्लुताङ्गः ।

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 1620, कुल 2580 में से · BharatKosha