भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1622

साँसें खींचते हुए वे क्रोधको सहन करते हैं ।। १५ ।। स चापि भूमौ परिवर्तमानो वधं सुतानां मम काङ्क्षमाणः । सत्येन धर्मेण च वार्यमाणः कालं प्रतीक्षत्यधिको रणेऽन्यैः ॥ १६ ॥ ‘रणभूमिमें भीमसेन दूसरोंकी अपेक्षा सदा अधिक पराक्रमी सिद्ध होते हैं। वे मेरे पुत्रोंके वधकी कामना करते हुए धरतीपर करवटें बदल रहे होंगे। सत्य और धर्मने ही उन्हें रोक रखा है; अतः वे भी अवसरकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं ।। १६ ।। अजातशत्रौ तु जिते निकृत्या दुःशासनो यत् परुषाण्यवोचत् । तानि प्रविष्टानि वृकोदराङ्गं दहन्ति कक्षाग्निरिवेन्धनानि ॥ १७ ॥ ‘अजातशत्रु युधिष्ठिरको जूएमें छलपूर्वक हरा दिये जानेपर दुःशासनने जो कड़वी बातें कही थीं, वे भीमसेनके शरीरमें घुसकर जैसे आग तृण और काष्ठके समूहको जला डालती है, उसी प्रकार उन्हें दग्ध कर रही होंगी ।। १७ ।। न पापकं ध्यास्यति धर्मपुत्रो धनंजयश्चाप्यनुवत्स्यते तम् । अरण्यवासेन विवर्धते तु भीमस्य कोपोऽग्निरिवानिलेन ॥ १८ ॥ ‘धर्मपुत्र युधिष्ठिर मेरे अपराधपर ध्यान नहीं देंगे। अर्जुन भी उन्हींका अनुसरण करेंगे। परंतु इस वनवाससे भीमसेनका क्रोध तो उसी प्रकार बढ़ रहा होगा, जैसे हवा लगनेसे आग धधक उठती है ।। १८ ।। स तेन कोपेन विदह्यमानः करं करेणाभिनिपीड्य वीरः । विनिःश्वसत्युष्णमतीव घोरं दहन्निवेमान् मम पुत्रपौत्रान् ॥ १९ ॥ ‘उस क्रोधसे जलते हुए वीरवर भीमसेन हाथसे हाथ मलकर इस प्रकार अत्यन्त भयंकर गर्म-गर्म साँस खींच रहे होंगे, मानो मेरे इन पुत्रों और पौत्रोंको अभी भस्म कर डालेंगे ।। १९ ।। गाण्डीवधन्वा च वृकोदरश्च संरम्भिणावन्तककालकल्पौ । न शेषयेतां युधि शत्रुसेनां शरान् किरन्तावशनिप्रकाशान् ॥ २० ॥