महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्त्रियश्च वृष्णिवीराणां किं मां वक्ष्यन्ति संहताः ॥ २१ ॥ ‘मैं शूरवीर, सम्भावित (सम्मानित), शान्तस्वभाव तथा सदा अपनेको वीर पुरुष माननेवाला समझा जाता हूँ। (युद्धसे भागनेपर) मुझे देखकर झुंड-की-झुंड एकत्र हुई वृष्णिवीरोंकी स्त्रियाँ मुझे क्या कहेंगी? ॥ २१ ॥
प्रद्युम्नोऽयमुपायाति भीतस्त्यक्त्वा महाहवम् । धिगेनमिति वक्ष्यन्ति न तु वक्ष्यन्ति साध्विति ॥ २२ ॥ ‘सब लोग यही कहेंगे—‘यह प्रद्युम्न भयभीत हो महान् संग्राम छोड़कर भागा आ रहा है; इसे धिक्कार है।’ उस अवस्थामें किसीके मुखसे मेरे लिये अच्छे शब्द नहीं निकलेंगे ॥ २२ ॥
धिग्वाचा परिहासोऽपि मम वा मद्धिधस्य वा । मृत्युनाभ्यधिकः सौते स त्वं मा व्यपयाः पुनः ॥ २३ ॥ ‘सूतकुमार! मेरे अथवा मेरे-जैसे किसी भी पुरुषके लिये धिक्कारयुक्त वाणीद्वारा कोई परिहास भी कर दे तो वह मृत्युसे भी अधिक कष्ट देनेवाला है; अतः तू फिर कभी युद्ध छोड़कर न भागना ॥ २३ ॥
भारं हि मयि संन्यस्य यातो मधुनिहा हरिः । यज्ञं भारतसिंहस्य न हि शक्योऽद्य मर्षितुम् ॥ २४ ॥ ‘मेरे पिता मधुसूदन भगवान् श्रीहरि यहाँकी रक्षाका सारा भार मुझपर रखकर भरतवंशशिरोमणि धर्मराज युधिष्ठिरके यज्ञमें गये हैं। (आज मुझसे जो अपराध हो गया है,) इसे वे कभी क्षमा नहीं कर सकेंगे ॥ २४ ॥
कृतवर्मा मया वीरो निर्यास्यन्नेव वारितः । शाल्वं निवारयिष्येऽहं तिष्ठ त्वमिति सूतज ॥ २५ ॥ ‘सूतपुत्र! वीर कृतवर्मा शाल्वका सामना करनेके लिये पुरीसे बाहर आ रहे थे; किंतु मैंने उन्हें रोक दिया और कहा—‘आप यहीं रहिये। मैं शाल्वको परास्त करूँगा’ ॥ २५ ॥
स च सम्भावयन् मां वै निवृत्तो हृदिकात्मजः । तं समेत्य रणं त्यक्त्वा किं वक्ष्यामि महारथम् ॥ २६ ॥ ‘कृतवर्मा मुझे इस कार्यके लिये समर्थ जानकर युद्धसे निवृत्त हो गये। आज युद्ध छोड़कर जब मैं उन महारथी वीरसे मिलूँगा, तब उन्हें क्या जवाब दूँगा? ॥ २६ ॥
उपयान्तं दुराधर्षं शङ्खचक्रगदाधरम् । पुरुषं पुण्डरीकाक्षं किं वक्ष्यामि महाभुजम् ॥ २७ ॥ ‘शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले कमलनयन महाबाहु एवं अजेय वीर भगवान् पुरुषोत्तम जब यहाँ मेरे निकट पदार्पण करेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? ॥ २७ ॥
सात्यकिं बलदेवं च ये चान्येऽन्धकवृष्णयः । मया स्पर्धन्ति सततं किं नु वक्ष्यामि तानहम् ॥ २८ ॥