महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1646, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! उस समय दूसरे-दूसरे गन्धर्वोंने शान्तिपूर्ण वचनोंद्वारा ही कौरव सैनिकोंको रोका। रोकनेपर भी उन गन्धर्वोंकी अवहेलना करके वे समस्त सैनिक उस महान् वनके भीतर प्रविष्ट हो गये। जब राजा दुर्योधनसहित समस्त कौरव वाणीद्वारा मना करनेपर न रुके, तब आकाशमें विचरनेवाले उन सभी गन्धर्वोंने राजा चित्रसेनसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ६-७ १/२ ॥
गन्धर्वराजस्तान् सर्वानब्रवीत् कौरवान् प्रति ॥ ८ ॥
अनार्याञ्छासतेत्येतांश्चित्रसेनोऽत्यमर्षतः ।
यह सुनकर गन्धर्वराज चित्रसेनको बड़ा अमर्ष हुआ। उन्होंने कौरवोंको लक्ष्य करके समस्त गन्धर्वोंको आज्ञा दी, 'अरे! इन दुष्टोंका दमन करो' ॥ ८ १/२ ॥
अनुज्ञाताश्च गन्धर्वाश्चित्रसेनेन भारत ॥ ९ ॥
प्रगृहीतायुधाः सर्वे धार्तराष्ट्रानभिद्रवन् ।
भारत! चित्रसेनकी आज्ञा पाते ही सब गन्धर्व अस्त्र-शस्त्र लेकर कौरवोंकी ओर दौड़े ॥ ९ १/२ ॥
तान् दृष्ट्वा पततः शीघ्रान् गन्धर्वानुद्यतायुधान् ॥ १० ॥
प्राद्रवंस्ते दिशः सर्वे धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ।
गन्धर्वोंको अस्त्र-शस्त्र लिये तीव्र वेगसे अपनी ओर आते देख वे सभी कौरव सैनिक दुर्योधनके देखते-देखते चारों ओर भागने लगे ॥ १० १/२ ॥
तान् दृष्ट्वा द्रवतःसर्वान् धार्तराष्ट्रान् पराङ्मुखान् ॥ ११ ॥
राधेयस्तु तदा वीरो नासीत् तत्र पराङ्मुखः ।
धृतराष्ट्रके सब पुत्रोंको युद्धसे विमुख हो भागते देखकर भी राधानन्दन वीर कर्णने वहाँ पीठ नहीं दिखायी ॥
आपतन्तीं तु सम्प्रेक्ष्य गन्धर्वाणां महाचमूम् ॥ १२ ॥
महता शरवर्षेण राधेयः प्रत्यवारयत् ।
गन्धर्वोंकी उस विशाल सेनाको अपनी ओर आती देख कर्णने भारी बाणवर्षा करके उसे आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १२ १/२ ॥
क्षुरप्रैर्विशिखैर्भल्लैर्वत्सदन्तैस्तथाऽयसैः ॥ १३ ॥
गन्धर्वाञ्छतशोऽभ्यघ्नँल्लघुत्वात् सूतनन्दनः ।
सूतपुत्र कर्णने अपने हाथोंकी फुर्तीके कारण लोहेके क्षुरप्र, विशिख, भल्ल और वत्सदन्त नामक बाणोंकी वर्षा करके सैकड़ों गन्धर्वोंको घायल कर दिया ॥ १३ १/२ ॥
पातयन्नुत्तमाङ्गानि गन्धर्वाणां महारथः ॥ १४ ॥
क्षणेन व्यधमत् सर्वां चित्रसेनस्य वाहिनीम् ।