भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1649

किन्हींने उसके रथका जुआ काट दिया, दूसरोंने ध्वजा काटकर गिरा दी। कुछ लोगोंने ईषादण्डके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। कुछ गन्धर्वोंने कर्णके घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया तथा दूसरोंने सारथिको मार गिराया ।। ३० ।।

अन्ये छत्रं वरूथं च बन्धुरं च तथापरे ।
गन्धर्वा बहुसाहस्रास्तिलशो व्यधमन् रथम् ।। ३१ ।।

किसी एकने छत्र, दूसरोंने वरूथ* और अन्य सैनिकोंने रथके बन्धन काट डाले। गन्धर्वोंकी संख्या कई हजार थी। उन्होंने कर्णके रथको तिल-तिल करके काट दिया ।। ३१ ।।

ततो रथादवप्लुत्य सूतपुत्रोऽसिचर्मभृत् ।
विकर्णरथमास्थाय मोक्षायाश्वानचोदयत् ।। ३२ ।।

तब सूतपुत्र कर्ण हाथमें तलवार और ढाल लिये अपने रथसे कूद पड़ा और विकर्णके रथपर बैठकर अपने प्राण बचानेके लिये उसके घोड़ोंको जोर-जोरसे हाँकने लगा ।। ३२ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णपराभवे
एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २४१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णपराजयविषयक दो सौ इकतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४१ ।।


* लोहेकी चद्दर या सीकड़ोंका बना हुआ आवरण वरूथ कहलाता है। पहले यह शत्रुके आघातसे रथको रक्षित रखनेके लिये उसके ऊपर डाला जाता था।