भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1651

राजेन्द्र! दुर्योधनके कैद हो जानेपर गन्धर्वोंने रथपर बैठे हुए दुःशासनको भी सब ओरसे घेरकर पकड़ लिया ।। ७ ।।
विविंशतिं चित्रसेनमादायान्ये विदुद्रुवुः ।
विन्दानुविन्दावपरे राजदारांश्च सर्वशः ।। ८ ।।

अन्य कितने ही गन्धर्व धृतराष्ट्रके पुत्र चित्रसेन और विविंशतिको बंदी बनाकर ले चले। कुछ अन्य गन्धर्वोंने विन्द और अनुविन्दको तथा राजकुलकी समस्त महिलाओंको भी अपने अधिकारमें ले लिया ।। ८ ।।
सैन्यं तद् धार्तराष्ट्रस्य गन्धर्वैः समभिद्रुतम् ।
पूर्वं प्रभग्नाः सहिताः पाण्डवानभ्ययुस्तदा ।। ९ ।।
गन्धर्वोंने दुर्योधनकी सारी सेनाको मार भगाया था। वह सेना तथा उसके वे सैनिक, जो पहलेसे ही मैदान छोड़कर भाग गये थे, सब एक साथ पाण्डवोंकी शरणमें गये ।। ९ ।।
शकटापणवेशांश्च यानयुग्यं च सर्वशः ।
शरणं पाण्डवान् जग्मुर्हियमाणे महीपतौ ।। १० ।।
गन्धर्व जब राजा दुर्योधनको बंदी बनाकर ले जाने लगे, उस समय छकड़े, रसदकी दूकान, वेष-भूषा, सवारी ढोने तथा कंधोंपर जुआ रखकर चलनेमें समर्थ बैल आदि सब उपकरणोंको साथ ले कौरव-सैनिक पाण्डवोंकी शरणमें गये ।। १० ।।