महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1687, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदा च शोचतः शोको व्यसनं नापकर्षति ।। ३७ ।। सामर्थ्यं किं ततः शोके शोचमानौ प्रपश्यथः । धृतिं गृहीत मा शत्रून् शोचन्तौ नन्दयिष्यथः ।। ३८ ।। जब शोक करनेवालेका शोक उसपर आये हुए संकटको टाल नहीं सकता है, तब उसमें क्या सामर्थ्य है? यह तुम दोनों भाई शोक करके प्रत्यक्ष देख रहे हो। अतः धैर्य धारण करो। शोक करके तो शत्रुओंका हर्ष ही बढ़ाओगे ।।
कर्तव्यं हि कृतं राजन् पाण्डवैस्तव मोक्षणम् । नित्यमेव प्रियं कार्यं राज्ञो विषयवासिभिः ।। ३९ ।। ‘राजन्! पाण्डवोंने गन्धर्वोंके हाथसे तुम्हें छुड़ाकर अपने कर्तव्यका ही पालन किया है। राजाके राज्यमें रहनेवालोंको सदा ही उसका प्रिय करना चाहिये ।। ३९ ।।
पाल्यमानास्त्वया ते हि निवसन्ति गतज्वराः । नार्हस्येवंगते मन्युं कर्तुं प्राकृतवद् यथा ।। ४० ।। ‘तुमसे सुरक्षित होकर वे यहाँ निश्चिन्ततापूर्वक निवास कर रहे हैं। ऐसी दशामें तुम्हें निम्न कोटिके मनुष्योंकी तरह दीनतापूर्ण खेद नहीं करना चाहिये ।। ४० ।।
विषण्णास्तव सोदर्यास्त्वयि प्रायं समास्थिते । (तदलं दुःखितानेतान् कर्तुं सर्वान् नराधिप ।।) उत्तिष्ठ व्रज भद्रं ते समाश्वासय सोदरान् ।। ४१ ।। ‘राजन्! तुम आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठे हो और इधर तुम्हारे सगे भाई शोक एवं विषादमें डूबे हुए हैं। बस, इन सबको दुःखी करनेसे कोई लाभ नहीं है। तुम्हारा भला हो। उठो, चलो और अपने भाइयोंको आश्वासन दो’ ।। ४१ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रायोपवेशे एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २४९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रायोपवेशनविषयक दो सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४१ १/३ श्लोक हैं)