महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1693, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतच्छ्रुत्वा सुहृदश्चैव समन्युरिदमब्रवीत् । न धर्मधनसौख्येन नैश्वर्येण न चाज्ञया ॥ १४ ॥ नैव भोगैश्च मे कार्यं मा विहन्यत गच्छत । निश्चितेयं मम मतिः स्थिता प्रायोपवेशने ॥ १५ ॥ गच्छध्वं नगरं सर्वे पूज्याश्च गुरवो मम । सब सुहृदोंके वचन सुनकर दुर्योधनने उनसे कुपित हो इस प्रकार कहा—'मुझे धर्म, धन, सुख, ऐश्वर्य, शासन और भोग किसीकी भी आवश्यकता नहीं है। तुमलोग मेरे निश्चयमें बाधा न डालो। यहाँसे चले जाओ। आमरण अनशन करनेके सम्बन्धमें मेरी बुद्धिका निश्चय अटल है। तुम सब लोग नगरको जाओ और वहाँ मेरे गुरुजनोंका सदा आदर-सत्कार करो' ॥ १४-१५ ½ ॥
त एवमुक्ताः प्रत्यूचू राजानमरिमर्दनम् ॥ १६ ॥ या गतिस्तव राजेन्द्र सास्माकमपि भारत । कथं वा सम्प्रवेक्ष्यामस्त्वद्विहीनाः पुरं वयम् ॥ १७ ॥ ऐसा उत्तर पाकर सब सुहृदोंने शत्रुदमन राजा दुर्योधनसे कहा—'राजेन्द्र! तुम्हारी जो गति होगी वही हमारी भी होगी। भारत! हम तुम्हारे बिना हस्तिनापुरमें कैसे प्रवेश करेंगे?' ॥ १६-१७ ॥
वैशम्पायन उवाच
स सुहृद्भिरमात्यैश्च भ्रातृभिः स्वजनेन च । बहुप्रकारमप्युक्तो निश्चयान्न विचाल्यते ॥ १८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! दुर्योधनको उसके सुहृद्, मन्त्री, भाई तथा स्वजनोंने बहुतेरा समझाया, परंतु कोई भी उसे अपने निश्चयसे विचलित न कर सका ॥ १८ ॥