महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्राश्रौषं नरव्याघ्र शाल्वं सागरमन्तिकात् । प्रयान्तं सौभमास्थाय तमहं पृष्ठतोऽन्वयाम् ॥ १६ ॥ नरव्याघ्र! वहाँ मैंने सुना कि शाल्व सौभविमानपर बैठकर समुद्रके निकट जा रहा है। तब मैं उसीके पीछे लग गया ॥ १६ ॥
ततः सागरमासाद्य कुक्षौ तस्य महोर्मिणः । समुद्रनाभ्यां शाल्वोऽभूत् सौभमास्थाय शत्रुहन् ॥ १७ ॥ शत्रुनाशन! फिर समुद्रके निकट पहुँचकर उत्ताल तरंगोंवाले महासागरकी कुक्षिके अन्तर्गत उसके नाभिदेश (एक द्वीप)-में जाकर राजा शाल्व सौभविमानपर ठहरा हुआ था ॥ १७ ॥
स समालोक्य दूरान्मां स्मयन्निव युधिष्ठिर । आह्वयामास दुष्टात्मा युद्धायैव मुहुर्मुहुः ॥ १८ ॥ युधिष्ठिर! वह दुष्टात्मा दूरसे ही मुझे देखकर मुसकराता हुआ-सा बारंबार युद्धके लिये ललकारने लगा ॥ १८ ॥
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्बहुभिर्मर्मभेदिभिः । पुंर नासाद्यत शरैस्ततो मां रोष आविशत् ॥ १९ ॥ मेरे शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए बहुत-से मर्मभेदी बाण शाल्वके विमानतक नहीं पहुँच सके। इससे मैं रोषमें भर गया ॥ १९ ॥
स चापि पापप्रकृतिर्दैतेयापसदो नृप । मय्यवर्षत दुर्धर्षः शरधाराः सहस्रशः ॥ २० ॥ राजन्! नीच दैत्य दुर्धर्ष राजा शाल्व स्वभावसे ही पापाचारी था। उसने मेरे ऊपर सहस्रों बाणधाराएँ बरसायीं ॥ २० ॥
सैनिकान् मम सूतं च हयांश्च समवाकिरत् । अचिन्तयन्तस्तु शरान् वयं युध्याम भारत ॥ २१ ॥ मेरे सारथि, घोड़ों तथा सैनिकोंपर उसने भी बाणोंकी झड़ी लगा दी। भारत! उसके बाणोंकी बौछारको कुछ न समझकर मैं युद्धमें ही लगा रहा ॥ २१ ॥
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् । चिक्षिपुः समरे वीरा मयि शाल्वपदानुगाः ॥ २२ ॥ तदनन्तर शाल्वके अनुगामी वीरोंने युद्धमें मेरे ऊपर झुकी हुई गाँठवाले लाखों बाण बरसाये ॥ २२ ॥
ते हयांश्च रथं चैव तदा दारुकमेव च । छादयामासुरासुरास्तैर्बाणैर्मर्मभेदिभिः ॥ २३ ॥ उस समय उन असुरोंने अपने मर्मवेधी बाणोंद्वारा मेरे घोड़ोंको, रथको और दारुकको भी ढक दिया ॥ २३ ॥