महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1727, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिहत्य पाण्डवान् सर्वानाहरिष्यामि कौरवाः ॥ १५ ॥ नृपश्रेष्ठ दुर्योधनने अपने पास खड़े हुए कौरवोंको सम्बोधित करके कहा—'कुरुकुलके राजकुमारो! कब ऐसा समय आयेगा जब मैं समस्त पाण्डवोंको मारकर प्रचुर धनसे सम्पन्न होनेवाले उस ऋतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करूँगा' ॥ १४-१५ ॥ तमब्रवीत् तदा कर्णः शृणु मे राजकुञ्जर । पादौ न धावये तावद् यावन्न निहतोऽर्जुनः ॥ १६ ॥ कीलालजं न खादेयं करिष्ये चासुरव्रतम् । नास्तीति नैव वक्ष्यामि याचितो येन केनचित् ॥ १७ ॥ उस समय कर्णने दुर्योधनसे कहा—'नृपश्रेष्ठ! मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो—'जबतक अर्जुन मेरे हाथसे मारा नहीं जाता, तबतक मैं दूसरोंसे पैर नहीं धुलवाऊँगा, केवल जलसे उत्पन्न पदार्थ नहीं खाऊँगा और आसुरव्रत (क्रूरता आदि) नहीं धारण करूँगा। किसीके भी कुछ माँगनेपर 'नहीं है', ऐसी बात नहीं कहूँगा' ॥ १६-१७ ॥ अथोत्कृष्टं महेष्वासैर्धार्तराष्ट्रैर्महारथैः । प्रतिज्ञाते फाल्गुनस्य वधे कर्णेन संयुगे ॥ १८ ॥ कर्णके द्वारा युद्धमें अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा करनेपर महान् धनुर्धर महारथी धृतराष्ट्रपुत्रोंने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ १८ ॥ विजितांश्चाप्यमन्यन्त पाण्डवान् धृतराष्ट्राः । दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र विसृज्य नरपुङ्गवान् ॥ १९ ॥ प्रविवेश गृहं श्रीमान् यथा चैत्ररथं प्रभुः । तेऽपि सर्वे महेष्वासा जग्मुर्वेश्मानि भारत ॥ २० ॥ उस दिनसे कौरव पाण्डवोंको पराजित ही मानने लगे। राजेन्द्र! तदनन्तर जैसे देवराज इन्द्र चैत्ररथ नामक उद्यानमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार श्रीमान् राजा दुर्योधनने उन नरपुंगवोंको विदा करके अपने महलमें प्रवेश किया। भारत! तदनन्तर वे सभी महाधनुर्धर वीर अपने-अपने भवनमें चले गये ॥ १९-२० ॥ पाण्डवाश्च महेष्वासा दूतवाक्यप्रचोदिताः । चिन्तयन्तस्तमेवार्थं नालभन्त सुखं क्वचित् ॥ २१ ॥ इधर महाधनुर्धर पाण्डव दूतके वाक्यसे प्रेरित हो उसी विषयका चिन्तन करते हुए कभी चैन नहीं पाते थे ॥ २१ ॥ भूयश्च चारै राजेन्द्र प्रवृत्तिरुपपादिता । प्रतिज्ञा सूतपुत्रस्य विजयस्य वधं प्रति ॥ २२ ॥ महाराज! फिर उन्होंने गुप्तचरोंद्वारा वह समाचार भी प्राप्त कर लिया, जिसमें अर्जुनके वधके लिये सूतपुत्र कर्णकी प्रतिज्ञा दोहरायी गयी थी ॥ २२ ॥ एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतः समुद्विग्नो नराधिप ।