भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1730

भवतो भ्रातरः शूराः सर्व एवास्त्रकोविदाः । कुलान्यल्पावशिष्टानि कृतवन्तो वनौकसाम् ॥ ६ ॥ ‘आपके सभी भाई शूरवीर एवं अस्त्रविद्याके पण्डित हैं। इन्होंने हम वनवासी हिंसक पशुओंके कुलोंको थोड़ी ही संख्यामें जीवित छोड़ा है ॥ ६ ॥

बीजभूता वयं केचिदवशिष्टा महामते । विवर्धेमहि राजेन्द्र प्रसादात् ते युधिष्ठिर ॥ ७ ॥ ‘महामते! हम सिंह, बाघ आदि पशु थोड़ी-सी संख्यामें अपने वंशके बीजमात्र शेष रह गये हैं। महाराज युधिष्ठिर! आपकी कृपासे हमारे वंशकी वृद्धि हो, यही हम निवेदन करते हैं’ ॥ ७ ॥

तान् वेपमानान् वित्रस्तान् बीजमात्रावशेषितान् । मृगान् दृष्ट्वा सुदुःखार्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ८ ॥ वे सिंह-बाघ आदि पशु त्रस्त होकर थर-थर काँप रहे थे और बीजमात्र ही शेष रह गये थे। उनकी यह दयनीय दशा देखकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखसे व्याकुल हो गये ॥ ८ ॥

तांस्तथेत्यब्रवीद् राजा सर्वभूतहिते रतः । यथा भवन्तो ब्रुवते करिष्यामि च तत् तथा ॥ ९ ॥ समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा—‘बहुत अच्छा, तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही करूँगा’ ॥ ९ ॥

इत्येवं प्रतिबुद्धः स रात्र्यन्ते राजसत्तमः । अब्रवीत् सहितान् भ्रातॄन् दयापन्नो मृगान् प्रति ॥ १० ॥ उक्तो रात्रौ मृगैरस्मि स्वप्नान्ते हतशेषितैः । तन्तुभूताः स्म भद्रं ते दया नः क्रियतामिति ॥ ११ ॥ इस प्रकार रात बीतनेपर जब सबेरे उनकी नींद खुली, तब वे नृपतिशिरोमणि हिंसक पशुओंके प्रति दयाभावसे द्रवित हो अपने सब भाइयोंसे बोले—‘बन्धुओ! रातको सपनेमें मरनेसे बचे हुए इस वनके पशुओंने मुझसे कहा है—‘राजन्! आपका भला हो। हम अपनी वंशपरम्पराके एक-एक तन्तुमात्र शेष रह गये हैं। अब हमलोगोंपर दया कीजिये’ ॥ १०-११ ॥

ते सत्यमाहुः कर्तव्या दयास्माभिर्वनौकसाम् । साष्टमासं हि नो वर्षं यदेतदुपयुङ्क्ष्महे ॥ १२ ॥ ‘मेरी समझमें वे पशु ठीक कहते हैं। हमलोगोंको वनवासी हिंस्र जीवोंपर भी दया करनी चाहिये। अबतक हमलोगोंको इस द्वैतवनमें रहते हुए एक वर्ष आठ महीने बीत चुके हैं ॥ १२ ॥

पुनर्बहुमृगं रम्यं काम्यकं काननोत्तमम् ।