भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1736

संविभक्ता च दाता च भोगवान् सुखवान् नरः । भवत्यहिंसकश्चैव परमारोग्यमश्नुते ॥ २४ ॥ 'जो देवताओं और अतिथियोंको उनका भाग समर्पित करता है वह भोगसामग्रीसे सम्पन्न होता है। दान करनेवाला मनुष्य सुखी होता है। जो किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता उसे उत्तम आरोग्यकी प्राप्ति होती है ॥ २४ ॥ मान्यमानयिता जन्म कुले महति विन्दति । व्यसनैर्न तु संयोगं प्राप्नोति विजितेन्द्रियः ॥ २५ ॥ (विन्दते सुखमत्यन्तमिह लोके परत्र च ।) 'जो माननीय पुरुषोंका सम्मान करता है वह महान् कुलमें जन्म पाता है। जितेन्द्रिय पुरुष कभी दुर्व्यसनोंमें नहीं फँसता है। उसे इस लोक और परलोकमें भी अत्यन्त सुखकी प्राप्ति होती है ॥ २५ ॥ शुभानुशयबुद्धिर्हि संयुक्तः कालधर्मणा । प्रादुर्भवति तद्योगात् कल्याणमतिरेव सः ॥ २६ ॥ 'जिसकी बुद्धि शुभमें ही आसक्त होती है, वह मनुष्य मृत्युको प्राप्त होनेपर उस शुभके संयोगसे कल्याणबुद्धि होकर ही उत्पन्न होता है' ॥ २६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

भगवन् दानधर्माणां तपसो वा महामुने । किंस्विद् बहुगुणं प्रेत्य किं वा दुष्करमुच्यते ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! महामुने! दानधर्म एवं तपस्या—इनमेंसे किसका फल परलोकमें अधिक माना गया है? और इन दोनोंमें कौन दुष्कर बताया जाता है ॥ २७ ॥

व्यास उवाच

दानान्न दुष्करं तात पृथिव्यामस्ति किंचन । अर्थे च महती तृष्णा स च दुःखेन लभ्यते ॥ २८ ॥ व्यासजीने कहा—तात! दानसे बढ़कर दुष्कर कार्य इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है। लोगोंको धनका लोभ अधिक होता है और धन मिलता भी बड़े कष्टसे है ॥ २८ ॥ परित्यज्य प्रियान् प्राणान् धनार्थं हि महामते । प्रविशन्ति नरा वीराः समुद्रमटवीं तथा ॥ २९ ॥ महामते! कितने ही साहसी मनुष्य रत्नोंके लिये अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर समुद्रमें गोते लगाते हैं और धनके लिये घोर जंगलोंमें भटकते फिरते हैं ॥ २९ ॥ कृषिगोरक्ष्यमित्येके प्रतिपद्यन्ति मानवाः । पुरुषाः प्रेष्यतामेके निर्गच्छन्ति धनार्थिनः ॥ ३० ॥