महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो गदा हलाः प्रासाः शूलशक्तिपरश्वधाः ॥ ३३ ॥ अस्यः शक्तिकुलिशपाशर्ष्टिकनपाः शराः । पट्टिशाश्च भुशुण्ड्यश्च प्रपतन्त्यनिशं मयि ॥ ३४ ॥ जो गिरते थे, उन्हें समुद्रमें रहनेवाले जीव-जन्तु निगल जाते थे। तत्पश्चात् मैंने गोदुग्ध, कुन्दपुष्प, चन्द्रमा, मृणाल तथा चाँदीकी-सी कान्तिवाले पांचजन्य नामक शंखको बड़े जोरसे फूँका। उन दानवोंको समुद्रमें गिरते देख सौभराज शाल्व महान् मायायुद्धके द्वारा मेरा सामना करने लगा। फिर तो मेरे ऊपर गदा, हल, प्रास, शूल, शक्ति, फरसे, खड्ग, शक्ति, वज्र, पाश, ऋष्टि, कनप, बाण, पट्टिश और भुशुण्डी आदि शस्त्रास्त्रोंकी निरन्तर वर्षा होने लगी ॥ ३१—३४ ॥
तामहं माययैवाशु प्रतिगृह्य व्यनाशयम् । तस्यां हतायां मायायां गिरिशृङ्गैरयोधयत् ॥ ३५ ॥ शाल्वकी उस मायाको मैंने मायाद्वारा ही नियन्त्रित करके नष्ट कर दिया। उस मायाका नाश होनेपर वह पर्वतके शिखरोंद्वारा युद्ध करने लगा ॥ ३५ ॥
ततोऽभवत् तम इव प्रकाश इव चाभवत् । दुर्दिनं सुदिनं चैव शीतोष्णं च भारत ॥ ३६ ॥ अङ्गारपांशुवर्षं च शस्त्रवर्षं च भारत । एवं मायां प्रकुर्वाणो योधयामास मां रिपुः ॥ ३७ ॥ तदनन्तर कभी अन्धकार-सा हो जाता, कभी प्रकाश-सा हो जाता, कभी मेघोंसे आकाश घिर जाता और कभी बादलोंके छिन्न-भिन्न होनेसे सुन्दर दिन प्रकट हो जाता था। कभी सर्दी और कभी गरमी पड़ने लगती थी। अंगार और धूलिकी वर्षाके साथ-साथ शस्त्रोंकी भी वृष्टि होने लगती। इस प्रकार शत्रुने मेरे साथ मायाका प्रयोग करते हुए युद्ध आरम्भ किया ॥ ३६—३७ ॥
विज्ञाय तदहं सर्वं माययैव व्यनाशयम् । यथाकालं तु युद्धेन व्यधमं सर्वतः शरैः ॥ ३८ ॥ वह सब जानकर मैंने मायाद्वारा ही उसकी मायाका नाश कर दिया। यथासमय युद्ध करते हुए मैंने बाणोंद्वारा शाल्वकी सेनाको सब ओरसे संतप्त कर दिया ॥ ३८ ॥
ततो व्योम महाराज शतसूर्यमिवाभवत् । शतचन्द्रं च कौन्तेय सहस्रायुततारकम् ॥ ३९ ॥ कुन्तीपुत्र महाराज युधिष्ठिर! इसके बाद आकाश सौ सूर्योंसे उद्भासित-सा दिखायी देने लगा। उसमें सैकड़ों चन्द्रमा और करोड़ों तारे दिखायी देने लगे ॥ ३९ ॥
ततो नाज्ञायत तदा दिवारात्रं तथा दिशः । ततोऽहं मोहमापन्नः प्रज्ञास्त्रं समयोजयम् ॥ ४० ॥