भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1751, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1751

'ओह! पतनके बाद तो स्वर्गवासी मनुष्योंको अत्यन्त भयंकर महान् दुःख और अनुताप होता है और फिर वे इसी लोकमें विचरते रहते हैं; इसलिये मुझे स्वर्गमें जानेकी इच्छा नहीं है ।। ४३ ।। यत्र गत्वा न शोचन्ति न व्यथन्ति चलन्ति वा । तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गयिष्यामि केवलम् ।। ४४ ।। 'जहाँ जाकर मनुष्य कभी शोक नहीं करते, व्यथित नहीं होते तथा जहाँसे विचलित नहीं होते हैं। केवल उसी अक्षय धामका मैं अनुसंधान करूँगा' ।। ४४ ।। इत्युक्त्वा स मुनिर्वाक्यं देवदूतं विसृज्य तम् । शिलोञ्छवृत्तिर्धर्मात्मा शममातिष्ठदुत्तमम् ।। ४५ ।। ऐसा कहकर मुद्गल मुनिने उस देवदूतको विदा कर दिया और शिल एवं उञ्छवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करनेवाले वे धर्मात्मा महर्षि उत्तम रीतिसे शम-दम आदि नियमोंका पालन करने लगे ।। ४५ ।। तुल्यनिन्दास्तुतिर्भूत्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः । ज्ञानयोगेन शुद्धेन ध्याननित्यो बभूव ह ।। ४६ ।। उनकी दृष्टिमें निन्दा और स्तुति समान हो गयी। वे मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझने लगे और विशुद्ध ज्ञानयोगके द्वारा नित्य ध्यानमें तत्पर रहने लगे ।। ध्यानयोगाद् बलं लब्ध्वा प्राप्य बुद्धिमनुत्तमाम् । जगाम शाश्वतीं सिद्धिं परां निर्वाणलक्षणाम् ।। ४७ ।। ध्यानसे (परम वैराग्यका) बल पाकर उन्हें उत्तम बोध प्राप्त हुआ और उसके द्वारा उन्होंने सनातन मोक्षरूपा परम सिद्धि प्राप्त कर ली ।। ४७ ।। तस्मात् त्वमपि कौन्तेय न शोकं कर्तुमर्हसि । राज्यात् स्फीतात् परिभ्रष्टस्तपसा तदवाप्स्यसि ।। ४८ ।। कुन्तीनन्दन! इसलिये तुम भी समृद्धिशाली राज्यसे भ्रष्ट होनेके कारण शोक न करो; तपस्याद्वारा तुम उसे प्राप्त कर लोगे ।। ४८ ।। सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । पर्यायेणोपसर्पन्ते नरं नेमिररा इव ।। ४९ ।। मनुष्यपर सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख बारी-बारीसे आते रहते हैं। जैसे अरे नेमिसे जुड़े हुए ऊँचे-नीचे आते रहते हैं, वैसे ही मनुष्यका दुःख-सुखसे सम्बन्ध होता रहता है ।। ४९ ।। पितृपैतामहं राज्यं प्राप्स्यस्यमितविक्रम । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ५० ।। अमितपराक्रमी युधिष्ठिर! तुम तेरहवें वर्षके बाद अपने बाप-दादोंका राज्य प्राप्त कर लोगे, अतः अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ५० ।।

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