महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1753, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें(द्रौपदीहरणपर्व)
द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना
जनमेजय उवाच
वसत्स्वेवं वने तेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
रममाणेषु चित्राभिः कथाभिर्मुनिभिः सह ॥ १ ॥
सूर्यदत्ताक्षयान्नेव कृष्णाया भोजनावधि ।
ब्राह्मणांस्तर्पमाणेषु ये चान्नार्थमुपागताः ॥ २ ॥
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानः सर्वे दुर्योधनादयः ।
कथं तेष्वन्ववर्तन्त पापाचारा महामुने ॥ ३ ॥
दुःशासनस्य कर्णस्य शकुनेश्च मते स्थिताः ।
एतदाचक्ष्व भगवन् वैशम्पायन पृच्छतः ॥ ४ ॥
**जनमेजयने पूछा—**महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा-वार्ताद्वारा मनोरञ्जन करते थे तथा जबतक द्रौपदी भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन्! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये ॥ १—४ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तेषां तथा वृत्तिं नगरे वसतामिव ।
दुर्योधनो महाराज तेषु पापमरोचयत् ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**महाराज! जब दुर्योधनने सुना कि पाण्डवलोग तो वनमें भी उसी प्रकार दान-पुण्य करते हुए आनन्दसे रह रहे हैं, जैसे नगरके निवासी रहा करते हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करनेका विचार किया ॥ ५ ॥
तथा तैर्निकृतिप्रज्ञैः कर्णदुःशासनादिभिः ।