भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1755

वर्तमाने तथा तस्मिन् यदा दुर्योधनो नृपः ॥ १४ ॥ विकृतिं नैति न क्रोधं तदा तुष्टोऽभवन्मुनिः । आह चैनं दुराधर्षो वरदोऽस्मीति भारत ॥ १५ ॥ भारत! ऐसा उन्होंने कई बार किया, तो भी जब राजा दुर्योधनके मनमें विकार या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ, तब वे दुर्धर्ष मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ' ॥ १४-१५ ॥

दुर्वासा उवाच

वरं वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते । मयि प्रीते तु यद् धर्म्यं नालभ्यं विद्यते तव ॥ १६ ॥ दुर्वासा बोले—राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके लिये वर माँगो। मेरे प्रसन्न होनेपर जो धर्मानुकूल वस्तु होगी, वह तुम्हारे लिये अलभ्य नहीं रहेगी ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य महर्षेर्भावितात्मनः । अमन्यत पुनर्जातमात्मानं स सुयोधनः ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि दुर्वासाका यह वचन सुनकर दुर्योधनने मन-ही-मन ऐसा समझा, मानो उसका नया जन्म हुआ हो ॥ १७ ॥

प्रागेव मन्त्रितं चासीत् कर्णदुःशासनादिभिः । याचनीयं मुनेस्तुष्टादिति निश्चित्य दुर्मतिः ॥ १८ ॥ अतिहर्षान्वितो राजन् वरमेनमायाचत । शिष्यैः सह मम ब्रह्मन् यथा जातोऽतिथिर्भवान् ॥ १९ ॥ अस्मत्कुले महाराजो ज्येष्ठः श्रेष्ठो युधिष्ठिरः । वने वसति धर्मात्मा भ्रातृभिः परिवारितः ॥ २० ॥ गुणवान् शीलसम्पन्नस्तस्य त्वमतिथिर्भव । मुनि संतुष्ट हों, तो क्या माँगना चाहिये, इस बातके लिये कर्ण और दुःशासन आदिके साथ उसकी पहलेसे ही सलाह हो चुकी थी। राजन्! उसी निश्चयके अनुसार दुर्बुद्धि दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह वर माँगा—'ब्रह्मन्! हमारे कुलमें महाराज युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं। इस समय वे धर्मात्मा पाण्डुकुमार अपने भाइयोंके साथ वनमें निवास करते हैं। युधिष्ठिर बड़े गुणवान् और सुशील हैं। जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए, उसी तरह शिष्योंके सहित आप उनके भी अतिथि होइये ॥ १८—२०१/२ ॥

यदा च राजपुत्री सा सुकुमारी यशस्विनी ॥ २१ ॥