भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1762, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1762

उपयुज्याब्रवीदेनामनेन हरिरीश्वरः । विश्वात्मा प्रीयतां देवस्तुष्टश्चास्त्विति यज्ञभुक् ॥ २५ ॥ यह सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदीसे फिर कहा—'कृष्णे! मैं तो भूख और थकावटसे आतुर हो रहा हूँ और तुझे हँसी सूझती है। यह परिहासका समय नहीं है। जल्दी जा और बटलोई लाकर मुझे दिखा। इस प्रकार हठ करके भगवान्‌ने द्रौपदीसे बटलोई मँगवायी। उसके गलेमें जरा-सा साग लगा हुआ था। उसे देखकर श्रीकृष्णने लेकर खा लिया और द्रौपदीसे कहा—'इस सागसे सम्पूर्ण विश्वके आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि तृप्त और संतुष्ट हों' ॥ २२-२५ ॥

आकारय मुनीन् शीघ्रं भोजनायेति चाब्रवीत् । सहदेवं महाबाहुः कृष्णः क्लेशविनाशनः ॥ २६ ॥ इतना कहकर सबका क्लेश दूर करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण सहदेवसे बोले—'तुम शीघ्र जाकर मुनियोंको भोजनके लिये बुला लाओ' ॥ २६ ॥

ततो जगाम त्वरितः सहदेवो महायशाः । आकारितुं तु तान् सर्वान् भोजनार्थं नृपोत्तम ॥ २७ ॥ स्नातुं गतान् देवनद्यां दुर्वासः प्रभृतीन् मुनीन् ।

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