भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1766

श्रीकृष्ण बोले— कुन्तीकुमारो! परम क्रोधी महर्षि दुर्वासासे आपलोगोंपर संकट आता जानकर द्रौपदीने मेरा स्मरण किया था, इसीलिये मैं तुरंत यहाँ आ पहुँचा। अब आपलोगोंको दुर्वासा मुनिसे तनिक भी भय नहीं है। वे आपके तेजसे डरकर पहले ही भाग गये हैं॥

धर्मनित्यास्तु ये केचिन्न ते सीदन्ति कर्हिचित्।
आपृच्छे वो गमिष्यामि नियतं भद्रमस्तु वः॥ ४४॥
जो लोग सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, वे कभी कष्टमें नहीं पड़ते। अब मैं आपलोगोंसे जानेके लिये आज्ञा चाहता हूँ। यहाँसे द्वारकापुरीको जाऊँगा। आपलोगोंका निरन्तर कल्याण हो॥ ४४॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैरितं केशवस्य बभूवुः स्वस्थमानसाः।
द्रौपद्या सहिताः पार्थास्तमूचुर्विगतज्वराः॥ ४५॥
त्वया नाथेन गोविन्द दुस्तरामापदं विभो।
तीर्णाः प्लवमिवासाद्य मज्जमाना महार्णवे॥ ४६॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर द्रौपदीसहित पाण्डवोंका चित्त स्वस्थ हुआ। उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी और वे भगवान्‌से इस प्रकार बोले—‘विभो! गोविन्द! तुम्हें अपना सहायक और संरक्षक पाकर हम बड़ी-बड़ी दुस्तर विपत्तियोंसे उसी प्रकार पार हुए हैं, जैसे महासागरमें डूबते हुए मनुष्य जहाजका सहारा पाकर पार हो जाते हैं॥ ४५-४६॥

स्वस्ति साधय भद्रं ते इत्याज्ञातो ययौ पुरीम्।
‘तुम्हारा कल्याण हो। इसी प्रकार भक्तोंका हित-साधन किया करो।’ पाण्डवोंके इस प्रकार कहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीको चले गये॥ ४६½॥

पाण्डवाश्च महाभाग द्रौपद्या सहिताः प्रभो॥ ४७॥
ऊषुः प्रहृष्टमनसो विहरन्तो वनाद् वनम्।
महाभाग जनमेजय! तत्पश्चात् द्रौपदीसहित पाण्डव प्रसन्नचित्त हो वहाँ एक वनसे दूसरे वनमें भ्रमण करते हुए सुखसे रहने लगे॥ ४७½॥

इति तेऽभिहितं राजन् यत् पृष्टोऽहमिह त्वया॥ ४८॥
एवंविधान्यलीकानि धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः।
पाण्डवेषु वनस्थेषु प्रयुक्तानि वृथाभवन्॥ ४९॥
राजन्! यहाँ तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बतला दिया। इस प्रकार दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंने वनवासी पाण्डवोंपर अनेक बार छल-कपटका प्रयोग किया, परंतु वह सब व्यर्थ हो गया॥ ४८-४९॥