भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1773, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1773

यस्यानुचक्रं ध्वजिनः प्रयान्ति सौवीरका द्वादश राजपुत्राः ॥ ९ ॥ शोणाश्वयुक्तेषु रधेषु सर्वे मखेषु दीप्ता इव हव्यवाहाः । अङ्गारकः कुञ्जरो गुप्तकश्च शत्रुञ्जयः संजयसुप्रवृद्धौ ॥ १० ॥ भयंकरोऽथ भ्रमरो रविश्च शूरः प्रतापः कुहनश्च नाम । यं षट् सहस्रा रथिनोऽनुयान्ति नागा हयाश्चैव पदातिनश्च ॥ ११ ॥ जयद्रथो नाम यदि श्रुतस्ते सौवीरराजः सुभगे स एषः । लाल रंगके घोड़ोंसे जुते हुए रथोंपर बैठकर यज्ञोंमें प्रज्वलित अग्निके समान सुशोभित होनेवाले अंगारक, कुञ्जर, गुप्तक, शत्रुञ्जय, संजय, सुप्रवृद्ध, भयंकर, भ्रमर, रवि, शूर, प्रताप तथा कुहन—सौवीरदेशके ये बारह राजकुमार जिनके रथके पीछे हाथमें ध्वजा लिये चलते हैं तथा छः हजार रथी, हाथी, घोड़े और पैदल जिनका अनुगमन करते हैं, उन सौवीरराज जयद्रथका नाम तुमने सुना होगा। सौभाग्यशालिनि! ये वे ही राजा जयद्रथ दिखायी दे रहे हैं ॥ ९—११ १/२ ॥

तस्यापरे भ्रातरोऽदीनसत्त्वा बलाहकानीकविदारणाद्याः ॥ १२ ॥ उनके दूसरे उदार हृदयवाले भाई बलाहक और अनीक—विदारण आदि भी उनके साथ हैं ॥ १२ ॥

सौवीरवीराः प्रवरा युवानो राजानमेते बलिनोऽनुयान्ति । एतैः सहायैरुपयाति राजा मरुद्गणैरिन्द्र इवाभिगुप्तः ॥ १३ ॥ सौवीरदेशके ये प्रमुख बलवान् नवयुवक वीर सदा राजा जयद्रथके साथ चलते हैं। राजा जयद्रथ इन सहायकोंसे सुरक्षित हो मरुद्गणोंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रकी भाँति यात्रा करते हैं ॥ १३ ॥

अजानतां ख्यापय नः सुकेशि कस्यासि भार्या दुहिता च कस्य ॥ १४ ॥ सुकेशि! हम तुमसे सर्वथा अनजान हैं, अतः हमें भी अपना परिचय दो; तुम किसकी पत्नी और किसकी पुत्री हो? ॥ १४ ॥