महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1794, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'द्रौपदी बाहर प्रकट हुई पाण्डवोंकी अन्तरात्मा है। अपने पतियोंसे सनाथ महारानी द्रौपदीको यहाँ कौन मूर्ख नहीं जानता था? आज पाण्डवोंके अत्यन्त भयंकर और तीक्ष्ण श्रेष्ठ बाण किसके शरीरको विदीर्ण करके पृथ्वीमें घुस जायँगे? ।। १४ १/२ ।।
मा त्वं शुचस्तां प्रति भीरु विद्धि
यथाद्य कृष्णा पुनरेष्यतीति ।। १५ ।।
निहत्य सर्वान् द्विषतः समग्रान्
पार्थाः समेष्यन्त्यथ याज्ञसेन्या ।
'भीरु! तू महारानी द्रौपदीके लिये शोक न कर। तू समझ ले कि अभी वे पुनः यहाँ आ जायेंगी। कुन्तीके पुत्र अपने समस्त शत्रुओंका संहार करके द्रुपदकुमारीसे अवश्य मिलेंगे' ।। १५ १/२ ।।
अथाब्रवीच्चारु मुखं प्रमृज्य
धात्रेयिका सारथिमिन्द्रसेनम् ।। १६ ।।
जयद्रथेनापहृता प्रमथ्य
पञ्चेन्द्रकल्पान् परिभूय कृष्णा ।
तिष्ठन्ति वर्त्मानि नवान्यमूनि
वृक्षाश्च न म्लान्ति तथैव भग्नाः ।। १७ ।।
तब अपने सुन्दर मुखपर बहते हुए आँसुओंको (दोनों हाथोंसे) पोंछकर धात्रेयिकाने सारथि इन्द्रसेनसे कहा—'इन्द्रसेन! इन्द्रके समान पराक्रमी इन पाँचों पाण्डवोंका अपमान करके जयद्रथने हठपूर्वक द्रौपदीका अपहरण किया है। देखो, उसके रथ और सैनिकोंके जानेसे जो ये नये मार्ग बन गये हैं, वे ज्यों-के-त्यों हैं, मिटे नहीं हैं तथा ये टूटे हुए वृक्ष भी अभी मुरझाये नहीं हैं ।। १६-१७ ।।
आवर्तयध्वं ह्यनुयात शीघ्रं
न दूरयातैव हि राजपुत्री ।
संनह्यध्वं सर्व एवेन्द्रकल्पा
महान्ति चारूणि च दंशनानि ।। १८ ।।
'इन्द्रके समान तेजस्वी समस्त पाण्डववीरो! आपलोग अपने रथोंको लौटाइये। शीघ्र शत्रुओंका पीछा कीजिये। अभी राजकुमारी द्रौपदी दूर नहीं गयी होगी। शीघ्र ही महान् एवं मनोहर कवच धारण कर लीजिये ।। १८ ।।
गृह्णीत चापानि महाधनानि
शरांश्च शीघ्रं पदवीं चरध्वम् ।
पुरा हि निर्भर्त्सनदण्डमोहिता
प्रमोहचित्ता वदनेन शुष्यता ।। १९ ।।
ददाति कस्मैचिदनर्हते तनुं