भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1796

बलेन मत्ता वञ्चनां प्राप्नुवन्ति ॥ २३ ॥ युधिष्ठिर बोले— भद्रे! हट जाओ। अपनी जबान बंद करो। हमारे निकट द्रौपदीके सम्बन्धमें ऐसी अनुचित और कठोर बातें मुँहसे न निकालो। जिन्होंने अपने बलके घमंडमें आकर ऐसा निन्दनीय कार्य किया है, वे राजा हों या राजकुमार, उन्हें अपने प्राण एवं सम्मानसे अवश्य वञ्चित होना पड़ेगा ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतावदुक्त्वा प्रययुर्हि शीघ्रं तान्येव वर्त्मान्यनुवर्तमानाः । मुहुर्मुहुर्व्यालवदुच्छ्वसन्तो ज्यां विक्षिपन्तश्च महाधनुर्भ्यः ॥ २४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर समस्त पाण्डव अपने विशाल धनुषकी डोरी खींचते और बार-बार सर्पोंके समान फुफकारते हुए उन्हीं मार्गोंपर चलते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़े ॥ २४ ॥

ततोऽपश्यंस्तस्य सैन्यस्य रेणु- मुद्भूतं वै वाजिखुरप्रणुन्नम् । पदातीनां मध्यगतं च धौम्यं विक्रोशन्तं भीममभिद्रवेति ॥ २५ ॥ तदनन्तर उन्हें जयद्रथकी सेनाके घोड़ोंकी टापसे आहत होकर उड़ती हुई धूल दिखायी दी। उसके साथ ही पैदल सैनिकोंके बीचमें होकर चलते हुए पुरोहित धौम्य भी दृष्टिगोचर हुए, जो बार-बार पुकार रहे थे—'भीमसेन! दौड़ो' ॥ २५ ॥

ते सान्त्व्य धौम्यं परिदीनसत्त्वाः सुखं भवानेत्विति राजपुत्राः । श्येना यथैवामिषसम्प्रयुक्ता जवेन तत् सैन्यमथाभ्यधावन् ॥ २६ ॥ तब असाधारण पराक्रमी राजकुमार पाण्डव धौम्य मुनिको सान्त्वना देते हुए बोले—'आप निश्चिन्त होकर चलिये, (हमलोग आ पहुँचे हैं)' फिर जैसे बाज मांसकी ओर झपटते हैं, उसी प्रकार पाण्डव जयद्रथकी सेनाके पीछे बड़े वेगसे दौड़े ॥ २६ ॥

तेषां महेन्द्रोपमविक्रमाणां संरब्धानां धर्षणाद् याज्ञसेन्याः । क्रोधः प्रजज्वाल जयद्रथं च दृष्ट्वा प्रियां तस्य रथे स्थितां च ॥ २७ ॥