भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1813, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1813

भी भीमसेनने उसे गिराकर उसके शरीरपर अपने दोनों घुटने रख दिये और उसे घूँसोंसे मारने लगे। इस प्रकार बड़े जोरकी मार पड़नेसे पीड़ाके मारे राजा जयद्रथ मूर्छित हो गया ॥ ४-५ ॥

सरोषं भीमसेनं तु वारयामास फाल्गुनः । दुःशलायाः कृते राजा यत् तदाहेति कौरव ॥ ६ ॥

इतनेपर भी भीमसेनका क्रोध कम नहीं हुआ। यह देख अर्जुनने उन्हें रोका और कहा—'कुरुनन्दन! दुःशलाके वैधव्यका खयाल करके महाराजने जो आज्ञा दी थी, उसका भी तो विचार कीजिये' ॥ ६ ॥

भीमसेन उवाच

नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुमर्हति । कृष्णायास्तदनर्हायाः परिक्लेश नराधमः ॥ ७ ॥

भीमसेनने कहा—इस नराधमने क्लेश पानेके अयोग्य द्रौपदीको कष्ट पहुँचाया है; अतः अब मेरे हाथसे इस पापाचारी जयद्रथका जीवित रहना ठीक नहीं है ॥ ७ ॥

किं नु शक्यं मया कर्तुं यद् राजा सततं घृणी । त्वं च बालिशया बुद्ध्या सदैवस्मान् प्रबाधसे ॥ ८ ॥

परंतु मैं क्या कर सकता हूँ? राजा युधिष्ठिर सदा दयालु ही बने रहते हैं और तुम भी अपनी बालबुद्धिके कारण मेरे ऐसे कामोंमें सदा बाधा पहुँचाया करते हो ॥ ८ ॥

एवमुक्त्वा सटास्तस्य पञ्च चक्रे वृकोदरः । अर्धचन्द्रेण बाणेन किंचिदब्रुवतस्तदा ॥ ९ ॥

ऐसा कहकर भीमने जयद्रथके लम्बे-लम्बे बालोंको अर्द्धचन्द्राकार बाणसे मूँड़कर पाँच चोटियाँ रख दीं। उस समय वह भयके मारे कुछ भी बोल नहीं पाता था ॥ ९ ॥

विकत्थयित्वा राजानं ततः प्राह वृकोदरः । जीवितुं चेच्छसे मूढ हेतुं मे गदतः शृणु ॥ १० ॥

तदनन्तर कटुवचनोंसे सिन्धुराजका तिरस्कार करते हुए भीमने उससे कहा—'अरे मूढ़! यदि तू जीवित रहना चाहता है तो जीवनरक्षाका हेतुभूत मेरा यह वचन सुन— ॥ १० ॥

दासोऽस्मीति तथा वाच्यं संसत्सु च सभासु च । एवं ते जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधिः ॥ ११ ॥

'तू राजाओंकी सभा-समितियोंमें जाकर सदा अपनेको (महाराज युधिष्ठिरका) दास बताया कर। यह शर्त स्वीकार हो, तो तुझे जीवन-दान दे सकता हूँ। युद्धमें विजयी पुरुषकी ओरसे हारे हुएके लिये ऐसा ही विधान है' ॥ ११ ॥

एवमस्त्विति तं राजा कृष्यमाणो जयद्रथः ।