भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1845, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1845

कुतो हि तव सौभाग्यं यस्याः पुत्रो न राज्यभाक् ॥ १८ ॥ ‘रानी कौसल्याका भाग्य अवश्य अच्छा है, जिनके पुत्रका राज्याभिषेक होगा। तुम्हारा ऐसा सौभाग्य कहाँ? जिसका पुत्र राज्यका अधिकारी ही नहीं है’॥

सा तद्वचनमाज्ञाय सर्वाभरणभूषिता । देवी विलग्नमध्येव बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ १९ ॥ विविक्ते पतिमासाद्य हसन्तीव शुचिस्मिता । प्रणयं व्यञ्जयन्तीव मधुरं वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥ मन्थराकी यह बात सुनकर सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली देवी कैकेयी समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो परम सुन्दर रूप बनाकर एकान्तमें अपने पतिके पास गयी। उसकी मुसकराहटसे उसके शुद्ध भावकी सूचना मिल रही थी। वह हँसती और प्रेम जताती हुई-सी मधुर वाणीमें बोली— ॥ १९-२० ॥

सत्यप्रतिज्ञ यन्मे त्वं काममेकं निसृष्टवान् । उपाकुरुष्व तद् राजंस्तस्मान्मुच्यस्व संकटात् ॥ २१ ॥ ‘सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले महाराज! आपने पहले जो ‘तेरा मनोरथ सफल करूँगा’ ऐसा वर दिया था, उसे आज पूर्ण कीजिये और उस संकटसे मुक्त हो जाइये’ ॥ २१ ॥

राजोवाच

वरं ददानि ते हन्त तद् गृहाण यदिच्छसि । अवध्यो वध्यतां कोऽद्य वध्यः कोऽद्य विमुच्यताम् ॥ २२ ॥ धनं ददानि कस्याद्य ह्रियतां कस्य वा पुनः । ब्राह्मणस्वादिहान्यत्र यत् किंचिद् वित्तमस्ति मे ॥ २३ ॥ राजाने कहा— प्रिये! यह तो बड़े हर्षकी बात है। मैं अभी तुम्हें वर देता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, ले लो। आज मैं तुम्हारे कहनेसे किस कैद करनेके अयोग्यको कैद कर दूँ अथवा किस कैद करनेयोग्यको मुक्त कर दूँ? किसे धन दे दूँ अथवा किसका सर्वस्व हरण कर लूँ? ब्राह्मणधनके अतिरिक्त यहाँ अथवा अन्यत्र जो कुछ भी मेरे पास धन है, उसपर तुम्हारा अधिकार है ॥ २२-२३ ॥

पृथिव्यां राजराजोऽस्मि चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता । यस्तेऽभिलषितः कामो ब्रूहि कल्याणि मा चिरम् ॥ २४ ॥ मैं इस समय इस भूमण्डलका राजराजेश्वर हूँ चारों वर्णोंकी रक्षा करनेवाला हूँ। कल्याणि! तुम्हारा जो भी अभिलषित मनोरथ हो, उसे बताओ, देर न करो ॥

सा तद्वचनमाज्ञाय परिगृह्य नराधिपम् । आत्मनो बलमाज्ञाय तत एनमुवाच ह ॥ २५ ॥

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