महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1860
मूर्धजेषु निजग्राह ऊर्ध्वमाचक्रमे ततः ।
तां ददर्श ततो गृध्रो जटायुर्गिरिगोचरः ।
रुदतीं राम रामेति ह्रियमाणां तपस्विनीम् ॥ ४३ ॥
तब रावणने उनके केश पकड़ लिये और आकाशमार्गसे लंकाकी ओर प्रस्थान किया। उस समय वे तपस्विनी सीता ‘हा राम-हा रामकी’ रट लगाती हुई रो रही थीं और वह राक्षस उन्हें हरकर लिये जा रहा था। इसी अवस्थामें एक पर्वतकी गुफामें रहनेवाले गृध्रराज जटायुने उन्हें देखा ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि मारीचवधे सीताहरणे च
अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें मारीचवध तथा सीताहरणविषयक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७८ ॥