भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1864

दह्यमानेन तु हृदा रामोऽभ्यपतदाश्रमम् । स ददर्श तदा गृध्रं निहतं पर्वतोपमम् ॥ १८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीका हृदय शोकाग्निसे दग्ध हो रहा था। वे शीघ्रतापूर्वक आश्रमकी ओर बढ़े। मार्गमें उन्हें पर्वताकार गृध्रराज जटायु दिखायी दिये, जो रावणके हाथसे घायल हुए पड़े थे ॥ १८ ॥

राक्षसं शङ्कमानस्तं विकृष्य बलवद् धनुः । अभ्यधावत काकुत्स्थस्ततस्तं सहलक्ष्मणः ॥ १९ ॥ लक्ष्मणसहित श्रीरामने उन्हें राक्षस समझकर अपने प्रबल धनुषको खींचा और उनपर धावा कर दिया ॥ १९ ॥

स तावुवाच तेजस्वी सहितौ रामलक्ष्मणौ । गृध्रराजोऽस्मि भद्रं वां सखा दशरथस्य वै ॥ २० ॥ तब तेजस्वी जटायुने साथ आये हुए श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंसे कहा—'आप दोनोंका भला हो। मैं राजा दशरथका मित्र गृध्रराज जटायु हूँ' ॥ २० ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा संगृह्य धनुषी शुभे । कोऽयं पितरमस्माकं नाम्नाऽऽहेत्यूचतुश्च तौ ॥ २१ ॥ उनकी ये बातें सुनकर उन्होंने अपने सुन्दर धनुष उतारकर हाथमें ले लिये और परस्पर पूछने लगे कि 'यह कौन है जो हमारे पिताका नाम लेकर परिचय दे रहा है' ॥ २१ ॥

ततो ददृशतुस्तौ तं छिन्नपक्षद्वयं खगम् । तयोः शशंस गृध्रस्तु सीतार्थे रावणाद् वधम् ॥ २२ ॥ तदनन्तर उन्होंने पास आकर देखा—जटायुके दोनों पंख कटे हुए हैं। गृध्रने बताया कि 'सीताको छुड़ानेके लिये युद्ध करते समय मैं रावणके हाथसे अत्यन्त घायल कर दिया गया हूँ' ॥ २२ ॥

अपृच्छद् राघवो गृध्रं रावणः कां दिशं गतः । तस्य गृध्रः शिरःकम्पैराचचक्षे ममार च ॥ २३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने जटायुसे पूछा—'रावण किस दिशाकी ओर गया है?' गृध्रने सिर हिलाकर संकेतसे दक्षिण दिशा बतायी और अपने प्राण त्याग दिये ॥ २३ ॥

दक्षिणामिति काकुत्स्थो विदित्वास्य तदिङ्गितम् । संस्कारं लम्भयामास सखायं पूजयन् पितुः ॥ २४ ॥ उनके संकेतके अनुसार दक्षिण दिशा समझ लेनेके पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने पिताके मित्र होनेके नाते जटायुको आदर देते हुए उनका विधिपूर्वक अन्त्येष्टि-संस्कार किया ॥ २४ ॥

ततो दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं व्यपविद्धबृसीमठम् । विध्वस्तकलशं शून्यं गोमायुशतसंकुलम् ॥ २५ ॥