भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1866, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1866

भाइयोंने देखा, सामने एक 'कबन्ध' (धड़) प्रकट हुआ है, जो देखनेमें अत्यन्त भयंकर है॥ २८॥ मेघपर्वतसंकाशं शालस्कन्धं महाभुजम्। उरोगतविशालाक्षं महोदरमहामुखम्॥ २९॥ वह मेघके समान काला और पर्वतके समान विशालकाय था। साखूकी शाखाके समान उसके कंधे और बड़ी-बड़ी भुजाएँ थीं। उसकी चौड़ी छातीमें दो बड़ी-बड़ी आँखें चमक रहीं थीं और लंबे-से पेटमें बहुत बड़ा मुख दिखायी दे रहा था॥ २९॥ यदृच्छयाथ तद् रक्षः करे जग्राह लक्ष्मणम्। विषादमगमत् सद्यः सौमित्रिरथ भारत॥ ३०॥ वह एक राक्षस था। उसने सहसा आकर लक्ष्मणका एक हाथ पकड़ लिया। भारत! यह देख सुमित्रानन्दन लक्ष्मण तत्काल बहुत दुःखी हो गये॥ ३०॥ स राममभिसम्प्रेक्ष्य कृष्यते येन तन्मुखम्। विषण्णश्चाब्रवीद् रामं पश्यावस्थामिमां मम॥ ३१॥ जिस ओर उस राक्षसका मुख था, उसी ओर वे खिंचे चले जा रहे थे। तब श्रीरामकी ओर देखकर वे अत्यन्त विषादग्रस्त होकर बोले—'भैया! देखिये, मेरी यह क्या अवस्था हो रही है?॥ ३१॥ हरणं चैव वैदेह्या मम चायमुपप्लवः। राज्यभ्रंशश्च भवतस्तातस्य मरणं तथा॥ ३२॥ 'विदेहकुमारीका अपहरण, मेरा इस प्रकार असमयमें विपत्तिग्रस्त होना, आपका राज्यसे निर्वासन तथा पिताजीकी मृत्यु—(इस प्रकार संकटपर संकट आता जा रहा है)॥ ३२॥ नाहं त्वां सह वैदेह्या समेतं कोसलागतम्। द्रक्ष्यामि पृथिवीराज्ये पितृपैतामहे स्थितम्॥ ३३॥ 'जान पड़ता है, जब आप सीताके साथ अयोध्यामें लौटकर पिता-पितामहोंकी परम्परासे प्राप्त हुए इस भूमण्डलके राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे, उस समय मैं आपका दर्शन न कर सकूँगा॥ ३३॥ द्रक्ष्यन्त्यार्यस्य धन्या ये कुशलाजशमीदलैः। अभिषिक्तस्य वदनं सोमं शान्तघनं यथा॥ ३४॥ 'जो लोग कुश, लाजा और शमीपत्र आदिके द्वारा राज्यपर अभिषिक्त हुए आप आर्यके मेघोंके आवरणसे रहित शरत्कालीन चन्द्रमाके समान मनोहर मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं'॥ ३४॥ एवं बहुविधं धीमान् विललाप स लक्ष्मणः। तमुवाचाथ काकुत्स्थः सम्भ्रमेष्वप्यसम्भ्रमः॥ ३५॥