महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1871, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमयि शिष्ये च भृत्ये च सहाये च समाश्वस ।। ६ ।। 'हम दोनों यहाँसे वानरराज सुग्रीवके पास चलें, जो ऋष्यमूक पर्वतके शिखरपर रहते हैं। मैं आपका शिष्य, सेवक और सहायक हूँ। मेरे रहते आपको धैर्य रखना चाहिये' ।। ६ ।।
एवं बहुविधैर्वाक्यैर्लक्ष्मणेन स राघवः । उक्तः प्रकृतिमापेदे कार्ये चानन्तरोऽभवत् ।। ७ ।। इस प्रकार लक्ष्मणद्वारा अनेक प्रकारके वचनोंसे धैर्य दिलाये जानेपर श्रीरामचन्द्रजी स्वस्थ हुए और आवश्यक कार्यमें लग गये ।। ७ ।।
निषेव्य वारि पम्पायास्तर्पयित्वा पितॄनपि । प्रतस्थतुरुभौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।। ८ ।। उन्होंने पम्पासरोवरके जलमें स्नान करके पितरोंका तर्पण किया। फिर उन दोनों वीर भ्राता श्रीराम और लक्ष्मणने वहाँसे प्रस्थान किया ।। ८ ।।
तावृष्यमूकमाभ्येत्य बहुमूलफलद्रुमम् । गिर्यग्रे वानरान् पञ्च वीरौ ददृशतुस्तदा ।। ९ ।। प्रचुर फल, मूल और वृक्षोंसे भरे हुए ऋष्यमूक पर्वतपर पहुँचकर उन दोनों वीरोंने देखा, पर्वतके शिखरपर पाँच वानर बैठे हुए हैं ।। ९ ।।
सुग्रीवः प्रेषयामास सचिवं वानरं तयोः । बुद्धिमन्तं हनूमन्तं हिमवन्तमिव स्थितम् ।। १० ।। सुग्रीवने हिमालयके समान गम्भीर भावसे बैठे हुए अपने बुद्धिमान् सचिव हनुमान्को उन दोनोंके पास भेजा ।। १० ।।
तेन सम्भाष्य पूर्वं तौ सुग्रीवमभिजग्मतुः । सख्यं वानरराजेन चक्रे रामस्तदा नृप ।। ११ ।। उनके साथ पहले बातचीत हो जानेपर वे दोनों भाई सुग्रीवके पास गये। राजन्! उस समय श्रीरामचन्द्रजीने वानरराज सुग्रीवके साथ मैत्री की ।। ११ ।।
तद् वासो दर्शयामासुस्तस्य कार्ये निवेदिते । वानराणां तु यत् सीता ह्रियमाणा व्यपासृजत् ।। १२ ।। रामने सुग्रीवके समक्ष जब अपना कार्य निवेदन किया, तब उन्होंने श्रीरामको वह वस्त्र दिखाया, जिसे अपहरणकालमें सीताने वानरोंके बीचमें डाल दिया था ।। १२ ।।