महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1874, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'इनके सिवा, मैन्द, द्विविद, वायुपुत्र हनुमान् तथा ऋक्षराज जाम्बवान्—ये सुग्रीवके चार मन्त्री हैं॥ २३॥ सर्व एते महात्मानो बुद्धिमन्तो महाबलाः। अलं तव विनाशाय रामवीर्यबलाश्रयात्॥ २४॥ 'ये सब-के-सब महामनस्वी, बुद्धिमान् और महाबली हैं। श्रीरामचन्द्रजीके बल-पराक्रमका सहारा मिल जानेसे ये लोग आपको मार डालनेमें समर्थ हैं'॥ २४॥ तस्यास्तदाक्षिप्य वचो हितमुक्तं कपीश्वरः। पर्यशङ्कत तामीर्षुः सुग्रीवगतमानसाम्॥ २५॥ यद्यपि ताराने वालीके हितकी बात कही थी, तो भी वानरराज वालीने उसके कथनपर आक्षेप किया और ईर्ष्यावश उसके मनमें यह शंका हो गयी कि तारा मन-ही-मन सुग्रीवको चाहती है॥ २५॥ तारां परुषमुक्त्वा तु निर्जगाम गुहामुखात्। स्थितं माल्यवतोऽभ्याशे सुग्रीवं सोऽभ्यभाषत॥ २६॥ ताराको कठोर बातें सुनाकर वाली किष्किन्धाकी गुफाके द्वारसे बाहर निकला और माल्यवान् पर्वतके निकट खड़े हुए सुग्रीवसे इस प्रकार बोला—॥ २६॥ असकृत् त्वं मया पूर्वं निर्जितो जीवितप्रियः। मुक्तो ज्ञातिरिति ज्ञात्वा का त्वरा मरणे पुनः॥ २७॥ 'अरे! तू तो पहले अनेक बार युद्धमें मेरेद्वारा परास्त हो चुका है और जीवनका अधिक लोभ होनेके कारण भागकर जान बचाता फिरा है। मैंने भी अपना भाई समझकर तुझे जीवित छोड़ दिया है। फिर आज तुझे मरनेके लिये इतनी उतावली क्यों हो गयी है?'॥ २७॥ इत्युक्तः प्राह सुग्रीवो भ्रातरं हेतुमद् वचः। प्राप्तकालममित्रघ्नो रामं सम्बोधयन्निव॥ २८॥ वालीके ऐसा कहनेपर शत्रुहन्ता सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीको परिस्थितिका ज्ञान कराते हुए-से अपने उस भाईसे अवसरके अनुरूप युक्तियुक्त वचन बोले—॥ २८॥ हृतराज्यस्य मे राजन् हृतदारस्य च त्वया। किं मे जीवितसामर्थ्यमिति विद्धि समागतम्॥ २९॥ 'राजन्! तुमने मेरा राज्य हर लिया है, मेरी स्त्रीको भी अपने अधिकारमें कर लिया है, ऐसी दशामें मुझमें जीवित रहनेकी शक्ति ही कहाँ है? यही सोचकर मरनेके लिये चला आया हूँ। आप मेरे आगमनका यही उद्देश्य समझ लें'॥ २९॥ एवमुक्त्वा बहुविधं ततस्तौ संनिपेततुः। समरे वालिसुग्रीवौ शालतालशिलायुधौ॥ ३०॥ इस प्रकार बहुत-सी बातें करके वाली और सुग्रीव दोनों एक-दूसरेसे गुँथ गये। उस युद्धमें साखू और ताड़के वृक्ष तथा पत्थरकी चट्टानें—ये ही उनके अस्त्र-शस्त्र थे॥ ३०॥