महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंचल दिये ॥ ४८ ॥
ततः प्रयाते दाशार्हे धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः ।
द्रौपदेयानुपादाय प्रययौ स्वपुरं तदा ॥ ४९ ॥
श्रीकृष्णके चले जानेपर द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने भी द्रौपदीकुमारोंको साथ ले अपनी राजधानीको प्रस्थान किया ॥ ४९ ॥
धृष्टकेतुः स्वसारं च समादायाथ चेदिराट् ।
जगाम पाण्डवान् दृष्ट्वा रम्यां शुक्तिमतीं पुरीम् ॥ ५० ॥
चेदिराज धृष्टकेतु भी अपनी बहिन करेणुमतीको, जो नकुलकी भार्या थी, साथ ले पाण्डवोंसे मिल-जुलकर अपनी सुरम्य राजधानी शुक्तिमतीपुरीको चले गये ॥ ५० ॥
केकयाश्चाप्यनुज्ञाताः कौन्तेयेनामितौजसा ।
आमन्त्र्य पाण्डवान् सर्वान् प्रययुस्तेऽपि भारत ॥ ५१ ॥
भारत! केकयराजकुमार भी अमित तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पा समस्त पाण्डवोंसे विदा लेकर अपने नगरको चले गये ॥ ५१ ॥
ब्राह्मणाश्च विशश्चैव तथा विषयवासिनः ।
विसृज्यमानाः सुभृशं न त्यजन्ति स्म पाण्डवान् ॥ ५२ ॥
युधिष्ठिरके राज्यमें रहनेवाले ब्राह्मण तथा वैश्य बारंबार विदा करनेपर भी पाण्डवोंको छोड़कर जाना नहीं चाहते थे ॥ ५२ ॥
समवायः स राजेन्द्र सुमहानद्भुतदर्शनः ।
आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ ॥ ५३ ॥
भरतवंशभूषण महाराज जनमेजय! उस समय काम्यकवनमें उन महात्माओंका बड़ा अद्भुत सम्मेलन जुटा था ॥ ५३ ॥
युधिष्ठिरस्तु विप्रांस्ताननुमान्य महामनाः ।
शशास पुरुषान् काले रथान् योजयतेति वै ॥ ५४ ॥
तदनन्तर महामना युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंकी अनुमतिसे अपने सेवकोंको समयपर आज्ञा दी—‘रथोंको जोतकर तैयार करो’ ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने
द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक
बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥