महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1888, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदर्थं निहतो वाली मया रघुकुलोद्वह । त्वया सह महाबाहो किष्किन्धोपवने तदा ॥ ७ ॥ ‘रघुकुलतिलक महाबाहु लक्ष्मण! इसी सुग्रीवके लिये उन दिनों मैंने तुम्हारे साथ किष्किन्धाके उद्यानमें जाकर वालीका वध किया था ॥ ७ ॥
कृतघ्नं तमहं मन्ये वानरापसदं भुवि । यो मामेवंगतो मूढो न जानीतेऽद्य लक्ष्मण ॥ ८ ॥ ‘सुमित्रानन्दन! मैं तो उस नीच वानरको इस भूतलपर कृतघ्न मानता हूँ, क्योंकि वह मूर्ख इस अवस्थामें पहुँचकर मुझे भूल गया है ॥ ८ ॥
असौ मन्ये न जानीते समयप्रतिपालनम् । कृतोपकारं मां नूनमवमन्याल्पया धिया ॥ ९ ॥ ‘मैं तो समझता हूँ, वह अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन करना नहीं जानता और अपनी मन्दबुद्धिके कारण मुझ उपकारीकी भी वह निश्चय ही अवहेलना कर रहा है ॥ ९ ॥
यदि तावदनुद्युक्तः शेते कामसुखात्मकः । नेतव्यो वालिमार्गेण सर्वभूतगतिं त्वया ॥ १० ॥ ‘यदि वह विषयसुखमें ही आसक्त हो सीताकी खोजके लिये कुछ उद्योग न कर रहा हो तो उसे भी तुम वालीके मार्गसे उसी लोकको पहुँचा देना, जहाँ एक-न-एक दिन सभी प्राणियोंको जाना पड़ता है ॥ १० ॥
अथापि घटतेऽस्माकमर्थे वानरपुङ्गवः । तमादायैव काकुत्स्थ त्वरावान् भव मा चिरम् ॥ ११ ॥