महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1893, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंहनुमत्प्रमुखाश्चापि विश्रान्तास्ते प्लवङ्गमाः । अभिजग्मुर्हरीन्द्रं तं रामलक्ष्मणसंनिधौ ॥ ३१ ॥ हनुमान् आदि श्रेष्ठ वानर विश्राम कर लेनेके पश्चात् श्रीराम और लक्ष्मणके समीप बैठे हुए उन वानरराज सुग्रीवके पास गये ॥ ३१ ॥
गतिं च मुखवर्णं च दृष्ट्वा रामो हनूमतः । अगमत् प्रत्ययं भूयो दृष्टा सीतेति भारत ॥ ३२ ॥ युधिष्ठिर! हनुमान्जीकी चाल-ढाल और मुखकी कान्ति देखकर श्रीरामचन्द्रजीको यह विश्वास हो गया कि इन्होंने सीताको देखा है ॥ ३२ ॥
हनुमत्प्रमुखास्ते तु वानराः पूर्णमानसाः । प्रणेमुर्विधिवद् रामं सुग्रीवं लक्ष्मणं तथा ॥ ३३ ॥ सफलमनोरथ हुए हनुमान् आदि प्रमुख वानरोंने श्रीराम, सुग्रीव तथा लक्ष्मणको विधिपूर्वक प्रणाम किया ॥ ३३ ॥
तानुवाचानतान् रामः प्रगृह्य सशरं धनुः । अपि मां जीवयिष्यध्वमपि वः कृतकृत्यता ॥ ३४ ॥ उस समय श्रीरामचन्द्रजी धनुष-बाण लेकर उन प्रणाम करते हुए वानरोंसे पूछा—'क्या तुमलोग सीताका अमृतमय समाचार सुनाकर मुझे जीवनदान दोगे? क्या तुम लोगोंको अपने कार्यमें सफलता मिली है? ॥ ३४ ॥
अपि राज्यमयोध्यायां कारयिष्याम्यहं पुनः । निहत्य समरे शत्रूनाहृत्य जनकात्मजाम् ॥ ३५ ॥ 'क्या मैं युद्धमें शत्रुओंको मारकर जनकनन्दिनी सीताको साथ ले पुनः अयोध्यामें रहकर राज्य करूँगा? ॥
अमोक्षयित्वा वैदेहीमहत्वा च रणे रिपून् । हृतदारोऽवधूतश्च नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ३६ ॥ 'विदेहनन्दिनी सीताको बिना छुड़ाने तथा समरभूमिमें शत्रुओंका बिना संहार किये पत्नीको खोकर और अवधूत बनकर मैं जीवित नहीं रह सकता' ॥ ३६ ॥
इत्युक्तवचनं रामं प्रत्युवाचानिलात्मजः । प्रियमाख्यामि ते राम दृष्टा सा जानकी मया ॥ ३७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वायुपुत्र हनुमान्जीने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—'श्रीराम! मैं आपको प्रिय समाचार सुना रहा हूँ। मैंने जनकनन्दिनी सीताका दर्शन किया है ॥ ३७ ॥
विचित्य दक्षिणामाशां सपर्वतवनाकराम् । श्रान्ताः काले व्यतीते स्म दृष्टवन्तो महागुहाम् ॥ ३८ ॥