महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1895, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतया दत्तानि भोज्यानि पानानि विविधानि च । भुक्त्वा लब्धबलाः सन्तस्तयोक्तेन पथा ततः ॥ ४२ ॥ निर्याय तस्मादुद्देशात् पश्यामो लवणाम्भसः । समीपे सह्यमलयौ दर्दुरं च महागिरिम् ॥ ४३ ॥ ‘उसने हमें अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ तथा भाँति-भाँतिके पीने योग्य रस दिये। उन्हें खाकर हमें नूतन बल प्राप्त हुआ। फिर उसीके बताये हुए मार्गसे जब हम गुफासे बाहर निकले, तब हमें लवणसमुद्रके निकटवर्ती सह्य, मलय और दर्दुर नामक महान् पर्वत दिखायी दिये ॥ ४२-४३ ॥
ततो मलयमारुह्य पश्यन्तो वरुणालयम् । विषण्णा व्यथिताः खिन्ना निराशा जीविते भृशम् ॥ ४४ ॥ ‘फिर हमलोग मलयाचलपर चढ़कर समुद्रकी ओर देखने लगे। उसकी विशालता देखकर हमारा हृदय विषादसे भर गया। हम खिन्न और व्यथित हो गये। हमें जीवनकी कोई आशा न रही ॥ ४४ ॥
अनेकशतविस्तीर्णं योजनानां महोदधिम् । तिमिनक्रझषावासं चिन्तयन्तः सुदुःखिताः ॥ ४५ ॥ ‘उस महासागरका विस्तार कई सौ योजनोंमें था। उसमें तिमि, मगर और बड़े-बड़े मत्स्य निवास करते थे। उसके इस स्वरूपका स्मरण करके हम सब लोग बहुत दुःखी हो गये ॥ ४५ ॥
तत्रानशनसंकल्पं कृत्वाऽऽसीना वयं तदा । ततः कथान्ते गृध्रस्य जटायोरभवत् कथा ॥ ४६ ॥ ‘अन्तमें अनशन करके प्राण त्याग देनेका संकल्प लेकर हम सब लोग वहाँ बैठ गये। फिर आपसमें बातचीत होने लगी और बीचमें जटायुका प्रसंग छिड़ गया ॥ ४६ ॥
ततः पर्वतशृङ्गाभं घोररूपं भयावहम् । पक्षिणं दृष्टवन्तः स्म वैनतेयमिवापरम् ॥ ४७ ॥ ‘इतनेमें ही हमने दूसरे गरुड़की भाँति एक भयंकर पक्षीको देखा जो पर्वतशिखरके समान जान पड़ता था। उसका स्वरूप बड़ा डरावना था ॥ ४७ ॥
सोऽस्मानतर्कयद् भोक्तुमथाभ्येत्य वचोऽब्रवीत् । भोः क एष मम भ्रातुर्जटायोः कुरुते कथाम् ॥ ४८ ॥ सम्पातिर्नाम तस्याहं ज्येष्ठो भ्राता खगाधिपः । अन्योन्यस्पर्धयारूढावावामादित्यसत्पदम् ॥ ४९ ॥ ‘वह पक्षी हमें खा जानेकी युक्ति सोचने लगा। फिर हमारे पास आकर बोला—‘अजी! कौन मेरे भाई जटायुकी बात कर रहा था। मैं उसका बड़ा भाई पक्षिराज सम्पाति हूँ। हम