भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1902

तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते ॥ १४ ॥ तेन व्यूढेन सैन्येन लोकानुद्धर्तयन्निव । प्रययौ राघवः श्रीमान् सुग्रीवसहितस्तदा ॥ १५ ॥ तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंके सब ओरसे एकत्र हो जानेपर सुग्रीवसहित भगवान् श्रीरामने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें युद्धके लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेनाके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करने जा रहे हैं ॥ १४-१५ ॥

मुखमासीत् तु सैन्यस्य हनूमान् मारुतात्मजः । जघनं पालयामास सौमित्रिरकुतोभयः ॥ १६ ॥ उस सेनाके मुहानेपर वायुपुत्र हनुमान्‌जी विद्यमान थे। किसीसे भी भय न माननेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण उसके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहे थे ॥ १६ ॥

बद्धगोधाङ्गुलित्राणौ राघवौ तत्र जग्मतुः । वृतौ हरिमहामात्रैश्चन्द्रसूर्यौ ग्रहेरिव ॥ १७ ॥ दोनों रघुवंशी वीर श्रीराम और लक्ष्मण हाथोंमें गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहने हुए थे। वे ग्रहोंसे घिरे हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वानरजातीय मन्त्रियोंके बीचमें होकर चल रहे थे ॥ १७ ॥

प्रबभौ हरिसैन्यं तत् सालतालशिलायुधम् । सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदयं प्रति ॥ १८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख साल, ताल और शिलारूपी आयुध लिये वे समस्त वानर सैनिक सूर्योदयके समय पके हुए धानके विशाल खेतोंके समान जान पड़ते थे ॥

नलनीलाङ्गदक्राथमैन्दद्विविदपालिता । ययौ सुमहती सेना राघवस्यार्थसिद्धये ॥ १९ ॥ नल, नील, अंगद, क्राथ, मैन्द तथा द्विविदके द्वारा सुरक्षित हुई वह विशाल वानरसेना श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये आगे बढ़ती चली जा रही थी ॥ १९ ॥

विविधेषु प्रशस्तेषु बहुमूलफलेषु च । प्रभूतमधुमूलेषु वारिमत्सु शिवेषु च ॥ २० ॥ निवसन्ती निराबाधा तथैव गिरिसानुषु । उपायाद्धरिसेना सा क्षारोदमथ सागरम् ॥ २१ ॥ जहाँ फल-मूलकी बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध होते तथा जलकी अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधाके खारे पानीवाले समुद्रके निकट जा पहुँची ॥ २०-२१ ॥

द्वितीयसागरनिभं तद् बलं बहुलध्वजम् ।