भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1904, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1904

'इसके सिवा नौका आदिसे यात्रा करनेपर हमारी सेना छिट-फुट होकर बहुत दूरतक फैल जायगी। उस दशामें अवसर पाकर शत्रु इसका नाश भी कर सकता है। इसीलिये डोंगी और नाव आदिपर बैठकर पार उतरनेकी बात मुझे ठीक नहीं जँचती है ॥ २९ ॥ अहं त्विमं जलनिधिं समारप्स्याम्युपायतः । प्रतिशेष्याम्युपवसन् दर्शयिष्यति मां ततः ॥ ३० ॥ 'मैं तो किसी उपायसे इस समुद्रकी ही आराधना आरम्भ करूँगा। इसके तटपर अन्न-जल छोड़कर धरना दूँगा। इससे यह अवश्य मुझे दर्शन देगा तथा कोई मार्ग दिखायेगा ॥ ३० ॥ न चेद् दर्शयिता मार्गं धक्ष्याम्येनमहं ततः । महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलैः ॥ ३१ ॥ 'यदि यह स्वयं प्रकट होकर कोई मार्ग नहीं दिखायेगा तो मैं अग्नि और वायुसे भी अधिक तेजस्वी तथा कभी न चूकनेवाले महान् दिव्यास्त्रोंद्वारा इसे जलाकर भस्म कर डालूँगा' ॥ ३१ ॥ इत्युक्त्वा सह सौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघवः । प्रतिशिश्ये जलनिधिं विधिवत् कुशसंस्तरे ॥ ३२ ॥ ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीने आचमन करके समुद्रके तटपर कुशकी चटाई बिछाकर उसपर लेटकर विधिपूर्वक धरना दे दिया ॥ ३२ ॥ सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शयामास राघवम् । देवो नदनदीभर्ता श्रीमान् यादोगणैर्वृतः ॥ ३३ ॥ तब नदों और नदियोंके स्वामी श्रीमान् समुद्रदेवने जल-जन्तुओंके साथ प्रकट होकर स्वप्नमें श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया ॥ ३३ ॥ कौसल्यामातरित्येवमाभाष्य मधुरं वचः । इदमित्याह रत्नानामाकरैः शतशो वृतः ॥ ३४ ॥ वह सैकड़ों रत्नके आकरोंसे घिरा हुआ था। उसने 'कौसल्यानन्दन' कहकर श्रीरामको सम्बोधित किया और मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा— ॥ ३४ ॥ ब्रूहि किं ते करोम्यत्र साहाय्यं पुरुषर्षभ । ऐक्ष्वाको ह्यस्मि ते ज्ञातिरिति रामस्तमब्रवीत् ॥ ३५ ॥ 'नरश्रेष्ठ! कहो, मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? सगरपुत्रोंसे संवर्धित होनेके कारण मैं भी इक्ष्वाकुवंशीय तथा तुम्हारा भाई-बन्धु हूँ'। यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा — ॥ ३५ ॥ मार्गामिच्छामि सैन्यस्य दत्तं नदनदीपते । येन गत्वा दशग्रीवं हन्यां पौलस्त्यपांसनम् ॥ ३६ ॥