भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1911

आह त्वां राघवो राजन् कोसलेन्द्रो महायशाः । प्राप्तकालमिदं वाक्यं तदादत्स्व कुरुष्व च ॥ १० ॥ राजन्! कोसलदेशके महाराज महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजीने तुमसे कहनेके लिये जो समयोचित संदेश भेजा है, उसे सुनो और तदनुसार कार्य करो ॥ १० ॥ अकृतात्मानमासाद्य राजानमनये रतम् । विनश्यन्त्यनयाविष्टा देशाश्च नगराणि च ॥ ११ ॥ ‘जो राजा अपने मनको काबूमें न रखकर अन्यायमें तत्पर रहता है, उसका आश्रय लेकर उसके अधीन रहनेवाले नगर और देश भी अनीतिपरायण होकर नष्ट हो जाते हैं’ ॥ ११ ॥ त्वयैकेनापराद्धं मे सीतामाहरता बलात् । वधायानपराद्धानामन्येषां तद् भविष्यति ॥ १२ ॥ ‘सीताका बलपूर्वक अपहरण करके मेरा अपराध तो अकेले तुमने किया है, परंतु इसके कारण अन्य निर्दोष लोग भी मारे जायँगे’ ॥ १२ ॥ ये त्वया बलदर्पाभ्यामविष्टेन वनेचराः । ऋषयो हिंसिताः पूर्वं देवाश्चाप्यवमानिताः ॥ १३ ॥ राजर्षयश्च निहता रुदत्यश्च हृताः स्त्रियः ।