भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1922

हरयो जातविस्रम्भा जघ्नुरन्ये च सैनिकान् ।। १५ ।। राक्षसप्रवर धूम्राक्षको मारा गया देख अन्य वानर तथा भालुओंको अपनी शक्तिपर विश्वास हुआ और वे उत्साहपूर्वक राक्षसोंको मारने लगे ।। १५ ।। ते वध्यमाना हरिभिर्बलिभिर्जितकाशिभिः । राक्षसा भग्नसंकल्पा लङ्कामभ्यपतन् भयात् ।। १६ ।। विजयसे उल्लसित हुए बलवान् वानर वीरोंकी मार खाकर राक्षस हताश हो गये और भयके मारे लंकाकी ओर भाग चले ।। १६ ।। तेऽभिपत्य पुरं भग्ना हतशेषा निशाचराः । सर्वं राज्ञे यथावृत्तं रावणाय न्यवेदयन् ।। १७ ।। मरनेसे बचे हुए उन निशाचरोंने भग्नमनोरथ होकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया तथा रावणके समीप जाकर युद्धका सब समाचार ज्यों-का-त्यों निवेदन कर दिया ।। १७ ।। श्रुत्वा तु रावणस्तेभ्यः प्रहस्तं निहतं युधि । धूम्राक्षं च महेष्वासं ससैन्यं वानरर्षभैः ।। १८ ।। सुदीर्घमिव निःश्वस्य समुत्पत्य वरासनात् । उवाच कुम्भकर्णस्य कर्मकालोऽयमागतः ।। १९ ।। उनके मुखसे श्रेष्ठ वानर वीरोंद्वारा युद्धमें सेनासहित प्रहस्त तथा महाधनुर्धर धूम्राक्षके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर रावण बड़ी देरतक शोकभरे उच्छ्वास लेता रहा। फिर वह अपने श्रेष्ठ सिंहासनसे उछलकर खड़ा हो गया और बोला—'अब यह कुम्भकर्णके पराक्रम दिखलानेका समय आ गया है' ।। १८-१९ ।। इत्येवमुक्त्वा विविधैर्वादित्रैः सुमहास्वनैः । शयानमतिनिद्रालुं कुम्भकर्णमबोधयत् ।। २० ।। ऐसा कहकर रावणने अत्यन्त उच्च स्वरसे बजनेवाले भाँति-भाँतिके बाजे बजवाकर अधिक नींद लेनेवाले सोये हुए कुम्भकर्णको जगाया ।। २० ।। प्रबोध्य महता चैनं यत्नेनागतसाध्वसः । स्वस्थमासीनमव्यग्रं विनिद्रं राक्षसाधिपः ।। २१ ।। ततोऽब्रवीद् दशग्रीवः कुम्भकर्णं महाबलम् । धन्योऽसि यस्य ते निद्रा कुम्भकर्णेयमीदृशी ।। २२ ।। महान् प्रयत्नद्वारा उसे जगाकर भयभीत हुए राक्षसराज रावणने, जब महाबली कुम्भकर्ण स्वस्थ, शान्त तथा निद्रारहित होकर बैठ गया, तब उससे इस प्रकार कहा—'भैया कुम्भकर्ण! तुम धन्य हो जिसे ऐसी नींद आती है ।। २१-२२ ।। य इदं दारुणाकारं न जानीषे महाभयम् । एष तीर्त्वार्णवं रामः सेतुना हरिभिः सह ।। २३ ।। अवमन्येह नः सर्वान् करोति कदनं महत् ।