भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1926, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1926

करजैरतुदंश्चान्ये विहाय भयमुत्तमम् । बहुधा युध्यमानास्ते युद्धमार्गैः प्लवङ्गमाः ॥ ४ ॥ नानाप्रहरणैर्भीमै राक्षसेन्द्रमताडयन् ।

कुछ वानरोंने कुम्भकर्णसे प्राप्त होनेवाले महान् भयकी परवा न करके उसको नखोंसे पीड़ा देनी प्रारम्भ की। युद्धकी विभिन्न प्रणालियोंद्वारा अनेक प्रकारसे युद्ध करते हुए वानरसैनिक भाँति-भाँतिके भयंकर आयुधोंद्वारा राक्षसराज कुम्भकर्णको चोट पहुँचाने लगे ।।

स ताड्यमानः प्रहसन् भक्षयामास वानरान् ॥ ५ ॥ बलं चण्डबलाख्यं च वज्रबाहुं च बानरम् ।

वानरोंके प्रहार करनेपर वह जोर-जोरसे हँसने और उन्हें पकड़-पकड़कर खाने लगा। देखते-देखते बल, चण्डबल और वज्रबाहु नामक वानर उसके मुखके ग्रास बन गये ।। ५ ½ ।।

तद् दृष्ट्वा व्यथनं कर्म कुम्भकर्णस्य रक्षसः ॥ ६ ॥ उदक्रोशन् परित्रस्तास्तारप्रभृतयस्तदा ।