भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

देवलोकाद् ब्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि ॥ ७ ॥ जो मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर सदा सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते रहते हैं। देवलोकसे लेकर ब्रह्मलोक तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंमें भी उनकी पहुँच है ॥ ७ ॥

अनुभावांश्च जानासि ब्राह्मणानां न संशयः । प्रभावांश्चैव वेत्थ त्वं सर्वेषामेव पार्थिव ॥ ८ ॥ राजन्! आप सभी ब्राह्मणोंके अनुभव और प्रभावको जानते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥

त्वमेव राजन् जानासि श्रेयःकारणमेव च । यत्रेच्छसि महाराज निवासं तत्र कुर्महे ॥ ९ ॥ राजन्! आप ही श्रेय (मोक्ष)-के कारणका ज्ञान रखते हैं। महाराज! आपकी जहाँ इच्छा हो वहीं हमलोग निवास करेंगे ॥ ९ ॥

इदं द्वैतवनं नाम सरः पुण्यजलोचितम् । बहुपुष्पफलं रम्यं नानाद्विजनिषेवितम् ॥ १० ॥ यह जो पवित्र जलसे भरा हुआ सरोवर है, इसका नाम द्वैतवन है। यहाँ फल और फूलोंकी बहुलता है। देखनेमें यह स्थान रमणीय तथा अनेक ब्राह्मणोंसे सेवित है ॥ १० ॥

अत्रेमा द्वादश समा विहरेमेति रोचये । यदि तेऽनुमतं राजन् किमन्यन्मन्यते भवान् ॥ ११ ॥ मेरी इच्छा है कि यहीं हमलोग इन बारह वर्षोंतक निवास करें। राजन्! यदि आपकी अनुमति हो तो द्वैतवनके समीप रहा जाय। अथवा आप दूसरे किस स्थानको उत्तम मानते हैं ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ममाप्येतन्मतं पार्थ त्वया यत् समुदाहृतम् । गच्छामः पुण्यविख्यातं महद् द्वैतवनं सरः ॥ १२ ॥ युधिष्ठिरने कहा—पार्थ! तुमने जैसा बताया है, वही मेरा भी मत है। हमलोग पवित्र जलके कारण प्रसिद्ध द्वैतवन नामक विशाल सरोवरके समीप चलें ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते प्रययुः सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्धं पुण्यं द्वैतवनं सरः ॥ १३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर वे सभी धर्मात्मा पाण्डव बहुत-से ब्राह्मणोंके साथ पवित्र द्वैतवन नामक सरोवरको चले गये ॥ १३ ॥

ब्राह्मणाः साग्निहोत्राश्च तथैव च निरग्नयः ।