महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1945, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशकन्धरराजसून्वोस्तथा युद्धमभून्महत् ॥ १९ ॥ रावणपर श्रीरामकी चढ़ाई होते ही समस्त प्राणी हाहाकार कर उठे, देवलोकमें नगारे बज उठे और जोर-जोरसे सिंहनाद होने लगा। दशकन्धर रावण तथा राजकुमार श्रीराममें उस समय महान् युद्ध छिड़ गया ॥ १८-१९ ॥ अलब्धोपममन्यत्र तयोरेव तथाभवत् । स रामाय महाघोरं विससर्ज निशाचरः ॥ २० ॥ शूलमिन्द्राशनिप्रख्यं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् । तच्छूलं सत्वरं रामश्छिच्छेद निशितैः शरैः ॥ २१ ॥ उस युद्धकी संसारमें अन्यत्र कहीं उपमा नहीं थी। उनका वह संग्राम उन्हींके संग्रामके समान था। निशाचर रावणने श्रीरामपर एक त्रिशूल चलाया, जो उठे हुए इन्द्रके वज्र तथा ब्रह्मदण्डके समान अत्यन्त भयंकर था; परंतु श्रीरामने तत्काल अपने तीखे बाणोंद्वारा उस त्रिशूलके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ २०-२१ ॥ तद् दृष्ट्वा दुष्करं कर्म रावणं भयमाविशत् । ततः क्रुद्धः ससर्जाशु दशग्रीवः शिताञ्छरान् ॥ २२ ॥ उनका वह दुष्कर कर्म देखकर दशानन रावणके मनमें भय समा गया। फिर कुपित होकर उसने तुरंत ही तीखे सायकोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ २२ ॥ सहस्रायुतशो रामे शस्त्राणि विविधानि च । ततो भुशुण्डीः शूलानि मुसलानि परश्वधान् ॥ २३ ॥ शक्तीश्च विविधाकाराः शतघ्नीश्च शितान् खुरान् । उस समय श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर भाँति-भाँतिके हजारों शस्त्र गिरने लगे तथा भुशुण्डी, शूल, मुसल, फरसे, नाना प्रकारकी शक्तियाँ, शतघ्नी और तीखी धारवाले बाणोंकी वृष्टि होने लगी ॥ २३ १/२ ॥ तां मायां विकृतां दृष्ट्वा दशग्रीवस्य रक्षसः ॥ २४ ॥ भयात् प्रदुद्रुवुः सर्वे वानराः सर्वतोदिशम् । राक्षस दशाननकी उस विकराल मायाको देखकर सब वानर भयके मारे चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ २४ १/२ ॥ ततः सुपत्रं सुमुखं हेमपुङ्खं शरोत्तमम् ॥ २५ ॥ तूणादादाय काकुत्स्थो ब्रह्मास्त्रेण युयोज ह । तं बाणवर्यं रामेण ब्रह्मास्त्रेणानुमन्त्रितम् ॥ २६ ॥ जहृषुर्देवगन्धर्वा दृष्ट्वा शक्रपुरोगमाः । अल्पावशेषमायुश्च ततोऽमन्यन्त रक्षसः ॥ २७ ॥ ब्रह्मास्त्रोदीरणाच्छत्रोर्देवदानवकिन्नराः ।