महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसके बाद उत्तम बुद्धिसे युक्त बूढ़े मन्त्री अविन्ध्य विभीषणसहित भगवती सीताको आगे करके लंकापुरीसे बाहर निकले ॥ ६ ॥ उवाच च महात्मानं काकुत्स्थं दैन्यमास्थितः । प्रतीच्छ देवीं सद्वृत्तां महात्मञ्जानकीमिति ॥ ७ ॥
वे ककुत्स्थकुलभूषण महात्मा श्रीरामचन्द्रजीसे दीनतापूर्वक बोले—'महात्मन्! सदाचारसे सुशोभित जनककिशोरी महारानी सीताको ग्रहण कीजिये' ॥ ७ ॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्मादवतीर्य रथोत्तमात् । बाष्पेणापिहितां सीतां ददर्शेक्ष्वाकुनन्दनः ॥ ८ ॥ यह सुनकर इक्ष्वाकुनन्दन भगवान् श्रीरामने उस उत्तम रथसे उतरकर सीताको देखा। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ ८ ॥ तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं यानस्थां शोककर्शिताम् । मलोपचितसर्वाङ्गीं जटिलां कृष्णवाससम् ॥ ९ ॥ शिबिकामें बैठी हुई सर्वांगसुन्दरी सीता शोकसे दुबली हो गयी थीं। उनके समस्त अंगोंमें मैल जम गयी थी, सिरके बाल आपसमें चिपककर जटाके रूपमें परिणत हो गये थे और उनका वस्त्र काला पड़ा गया था ॥ ९ ॥ उवाच रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कितः । गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत् कार्यं तन्मया कृतम् ॥ १० ॥