महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1984, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यवान्ने कहा— यदि तुम्हें चलनेका उत्साह है तो मैं तुम्हारा प्रिय मनोरथ पूर्ण करूँगा। परंतु तुम मेरे माता-पितासे पूछ लो, जिससे मुझे दोषका भागी न होना पड़े ॥
मार्कण्डेय उवाच
साभिवाद्याब्रवीच्छ्वश्रूं श्वशुरं च महाव्रता । अयं गच्छति मे भर्ता फलाहारो महावनम् ॥ २३ ॥ इच्छेयमभ्यनुज्ञाता आर्यया श्वशुरेण ह । अनेन सह निर्गन्तुं न मेऽद्य विरहः क्षमः ॥ २४ ॥ गुर्वग्निहोत्रार्थकृते प्रस्थितश्च सुतस्तव । न निवार्यो निवार्यः स्यादन्यथा प्रस्थितो वनम् ॥ २५ ॥ संवत्सरः किंचिदूनो न निष्क्रान्ताहमाश्रमात् । वनं कुसुमितं द्रष्टुं परं कौतूहलं हि मे ॥ २६ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— तब महान् व्रतका पालन करनेवाली सावित्रीने अपने सास-ससुरको प्रणाम करके कहा—'ये मेरे पतिदेव फल आदि लानेके लिये महान् वनमें जा रहे हैं। यदि सासजी और ससुरजी मुझे आज्ञा दें तो मैं भी इनके साथ जाना चाहती हूँ। आज मुझे इनका एक क्षणका भी विरह सहा नहीं जाता। आपके पुत्र आज गुरुजनोंके लिये तथा अग्निहोत्रके उद्देश्यसे फल, फूल और समिधा आदि लानेके लिये वनमें जा रहे हैं, अतः उनको रोकना उचित नहीं है। हाँ, यदि किसी दूसरे कार्यके लिये वनमें जाते होते तो उन्हें रोका भी जा सकता था। एक वर्षसे कुछ ही कम हुआ, मैं आश्रमसे बाहर नहीं निकली। अतः आज फूलोंसे भरे हुए वनको देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ २३—२६ ॥
द्युमत्सेन उवाच
यतः प्रभृति सावित्री पित्रा दत्ता स्नुषा मम । नानयाभ्यर्थनायुक्तमुक्तपूर्वं स्मराम्यहम् ॥ २७ ॥
द्युमत्सेन बोले— जबसे सावित्रीके पिताने इसे मेरी पुत्रवधू बनाकर दिया है, तबसे आजतक इसने पहले कभी मुझसे किसी बातके लिये प्रार्थना की हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ २७ ॥
तदेषा लभतां कामं यथाभिलषितं वधूः । अप्रमादश्च कर्तव्यः पुत्रि सत्यवतः पथि ॥ २८ ॥
अतः आज मेरी पुत्रवधू अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करे। बेटी! जा, सत्यवान्के मार्गमें सावधानी रखना ॥ २८ ॥
मार्कण्डेय उवाच