भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1995

ममात्मजं सत्यवतस्तथौरसं भवेदुभाभ्यामिह यत् कुलोद्वहम् । शतं सुतानां बलवीर्यशालिना- मिदं चतुर्थं वरयामि ते वरम् ॥ ४५ ॥ **सावित्रीने कहा—**मेरे और सत्यवान्—दोनोंके संयोगसे कुलकी वृद्धि करनेवाले, बल और पराक्रमसे सुशोभित सौ औरस पुत्र हों। यह मैं आपसे चौथा वर माँगती हूँ ॥ ४५ ॥

यम उवाच

शतं सुतानां बलवीर्यशालिनां भविष्यति प्रीतिकरं तवाबले । परिश्रमस्ते न भवन्नृपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥ ४६ ॥ **यमराज बोले—**अबले! तुझे बल और पराक्रमसे सम्पन्न सौ पुत्र प्राप्त होंगे; जो तेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले होंगे। राजकुमारी! अब तू लौट जा, जिससे तुझे थकावट न हो। तू रास्तेसे बहुत दूर चली आयी है ॥ ४६ ॥

सावित्र्युवाच

सतां सदा शाश्वतधर्मवृत्तिः सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति । सतां सद्भिर्नाफलः सङ्गमोऽस्ति सद्भ्यो भयं नानुवर्तन्ति सन्तः ॥ ४७ ॥ **सावित्रीने कहा—**सत्पुरुषोंकी वृत्ति निरन्तर धर्ममें ही लगी रहती है। श्रेष्ठ पुरुष कभी दुःखी या व्यथित नहीं होते। सत्पुरुषोंका संतोंके साथ जो समागम होता है, वह कभी निष्फल नहीं होता है। श्रेष्ठ पुरुष संतोंसे कभी भय नहीं मानते हैं ॥ ४७ ॥

सन्तो हि सत्येन नयन्ति सूर्यं सन्तो भूमिं तपसा धारयन्ति । सन्तो गतिर्भूतभव्यस्य राजन् सतां मध्ये नावसीदन्ति सन्तः ॥ ४८ ॥ श्रेष्ठ पुरुष सत्यके बलसे सूर्यका संचालन करते हैं। संत-महात्मा अपनी तपस्यासे इस पृथ्वीको धारण करते हैं। राजन्! सत्पुरुष ही भूत, वर्तमान और भविष्यके आश्रय हैं। श्रेष्ठ पुरुष संतोंके बीचमें रहकर कभी दुःख नहीं उठाते हैं ॥ ४८ ॥

आर्यजुष्टमिदं वृत्तमिति विज्ञाय शाश्वतम् । सन्तः परार्थं कुर्वाणा नावेक्षन्ति परस्परम् ॥ ४९ ॥