महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहामनाः कुरुवृषभो युधिष्ठिरः । अपूजयत् सुरऋषिमानवार्चितं महामुनिं ह्यनुपमसत्त्ववीर्यवान् ॥ ५ ॥ उनकी अंग-कान्ति प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रही थी। देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंद्वारा पूजित महामुनि मार्कण्डेयको आया देख अनुपम धैर्य और पराक्रमसे सम्पन्न महामनस्वी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उनकी यथावत् पूजा की ॥ ५ ॥
स सर्वविद् द्रौपदीं वीक्ष्य कृष्णां युधिष्ठिरं भीमसेनार्जुनौ च । संस्मृत्य रामं मनसा महात्मा तपस्विमध्येऽस्मयतामितौजाः ॥ ६ ॥ अमित तेजस्वी तथा सर्वज्ञ महात्मा मार्कण्डेयजी द्रुपदकुमारी कृष्णा, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन (और नकुल-सहदेव)-को देखकर मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके तपस्वियोंके बीचमें मुसकराने लगे ॥ ६ ॥
तं धर्मराजो विमना इवाब्रवीत् सर्वे ह्रिया सन्ति तपस्विनोऽमी । भवानिदं किं स्मयतीव हृष्ट- स्तपस्विनां पश्यतां मामुदीक्ष्य ॥ ७ ॥ तब धर्मराज युधिष्ठिरने उदासीन-से होकर पूछा—‘मुने! ये सब तपस्वी तो मेरी अवस्था देखकर कुछ संकुचित-से हो रहे हैं, परंतु क्या कारण है कि आप इन सब महात्माओंके सामने मेरी ओर देखकर प्रसन्नतापूर्वक यों मुसकराते-से दिखायी देते हैं?’ ॥ ७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
न तात हृष्यामि न च स्मयामि प्रहर्षजो मां भजते न दर्पः । तवापदं त्वद्य समीक्ष्य रामं सत्यव्रतं दाशरथिं स्मरामि ॥ ८ ॥ **मार्कण्डेयजी बोले—**तात! न तो मैं हर्षित होता हूँ और न मुसकराता ही हूँ। हर्षजनित अभिमान कभी मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। आज तुम्हारी यह विपत्ति देखकर मुझे सत्यप्रतिज्ञ दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण हो आया ॥ ८ ॥
स चापि राजा सह लक्ष्मणेन वने निवासं पितुरेव शासनात् । धन्वी चरन् पार्थ मयैव दृष्टो