भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2000, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2000

‘वे तेरी माता मालवीसे उत्पन्न होनेके कारण मालव नामसे विख्यात होंगे। तेरे भाई मालव क्षत्रिय पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न तथा देवताओंके समान तेजस्वी होंगे’॥ ६०॥
एवं तस्यै वरं दत्त्वा धर्मराजः प्रतापवान्।
निवर्तयित्वा सावित्रीं स्वमेव भवनं ययौ॥ ६१॥
सावित्रीको इस प्रकार वरदान दे प्रतापी धर्मराज उसे लौटाकर अपने लोकको चले गये॥ ६१॥
सावित्र्यपि यमे याते भर्तारं प्रतिलभ्य च।
जगाम तत्र यत्रास्या भर्तुः शावं कलेवरम्॥ ६२॥
यमराजके चले जानेपर सावित्री अपने पतिको पाकर उसी स्थानपर गयी; जहाँ पतिका मृत शरीर पड़ा था॥ ६२॥
सा भूमौ प्रेक्ष्य भर्तारमुपसृत्योपगृह्य च।
उत्सङ्गे शिर आरोप्य भूमावुपविवेश ह॥ ६३॥
वह पृथ्वीपर अपने पतिको पड़ा देख उनके पास गयी और पृथ्वीपर बैठ गयी, फिर पतिको उठाकर उसने उनके मस्तकको गोदीमें रख लिया॥ ६३॥
संज्ञां च स पुनर्लब्ध्वा सावित्रीमभ्यभाषत।
प्रोष्यागत इव प्रेम्णा पुनः पुनरुदीक्ष्य वै॥ ६४॥
तदनन्तर पुनः चेतना प्राप्त करके सत्यवान् परदेशमें रहकर लौटे हुए पुरुषकी भाँति बार-बार प्रेमपूर्वक सावित्रीकी ओर देखते हुए उससे बोले॥ ६४॥

सत्यवानुवाच
सुचिरं बत सुप्तोऽस्मि किमर्थं नावबोधितः।
क्व चासौ पुरुषः श्यामो योऽसौ मां संचकर्ष ह॥ ६५॥
सत्यवान्ने कहा— प्रिये! खेद है कि मैं बहुत देरतक सोता रह गया। तुमने मुझे जगा क्यों नहीं दिया? वे श्यामवर्णके पुरुष कहाँ हैं जिन्होंने मुझे खींचा था?॥ ६५॥

सावित्र्युवाच
सुचिरं त्वं प्रसुप्तोऽसि ममाङ्के पुरुषर्षभ।
गतः स भगवान् देवः प्रजासंयमनो यमः॥ ६६॥
सावित्री बोली— नरश्रेष्ठ! आप मेरी गोदमें बहुत देरतक सोते रह गये। वे श्यामवर्णके पुरुष प्रजाको संयममें रखनेवाले साक्षात् भगवान् यम थे, जो अब चले गये हैं॥ ६६॥
विश्रान्तोऽसि महाभाग विनिद्रश्च नृपात्मज।
यदि शक्यं समुत्तिष्ठ विगाढां पश्य शर्वरीम्॥ ६७॥
महाभाग! आपने विश्राम कर लिया। राजकुमार! अब आपकी नींद भी टूट चुकी है। यदि शक्ति हो तो उठिये; देखिये, प्रगाढ़ अन्धकारसे युक्त रात्रि हो गयी है॥ ६७॥

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