भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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(कुण्डलाहरणपर्व)

त्रिशततमोऽध्यायः

सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना

जनमेजय उवाच

यत् तत् तदा महद् बह्वाँल्लोमशो वाक्यमब्रवीत् ।
इन्द्रस्य वचनादेव पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ १ ॥
यच्चापि ते भयं तीव्रं न च कीर्तयसे क्वचित् ।
तच्चाप्यपहरिष्यामि धनंजय इतो गते ॥ २ ॥
किं नु तज्जपतां श्रेष्ठ कर्णं प्रति महत् भयम् ।
आसीन्न च स धर्मात्मा कथयामास कस्यचित् ॥ ३ ॥

जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! लोमशजीने इन्द्रके कथनानुसार उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे जो यह महत्वपूर्ण वचन कहा था कि 'तुम्हें जो बड़ा भारी भय लगा रहता है और जिसकी तुम किसीके सामने चर्चा भी नहीं करते, उसे भी मैं अर्जुनके यहाँ (स्वर्ग)-से चले जानेपर दूर कर दूँगा।' जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वैशम्पायनजी! धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिरको कर्णसे वह कौन-सा भारी भय था, जिसकी वे किसीके सम्मुख बात भी नहीं चलाते थे ॥ १—३ ॥

वैशम्पायन उवाच

अहं ते राजशार्दूल कथयामि कथामिमाम् ।
पृच्छतो भरतश्रेष्ठ शुश्रूषस्व गिरं मम ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— नृपश्रेष्ठ! भरतकुलभूषण! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं यह कथा सुनाऊँगा। तुम ध्यान देकर मेरी बात सुनो ॥ ४ ॥

द्वादशे समतिक्रान्ते वर्षे प्राप्ते त्रयोदशे ।
पाण्डूनां हितकृच्छक्रः कर्णं भिक्षितुमुद्यतः ॥ ५ ॥

जब पाण्डवोंके वनवासके बारह वर्ष बीत गये और तेरहवाँ वर्ष आस्मभ हुआ, तब पाण्डवोंके हितकारी इन्द्र कर्णसे कवच-कुण्डल माँगनेको उद्यत हुए ॥ ५ ॥