भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2022, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2022

कर्ण मद्वचनं तात शृणु सत्यभृतां वर । ब्रुवतोऽद्य महाबाहो सौहृदात् परमं हितम् ॥ १० ॥ ‘सत्यधारियोंमें श्रेष्ठ तात कर्ण! मेरी बात सुनो। महाबाहो! मैं सौहार्दवश आज तुम्हारे परम हितकी बात कहता हूँ ॥ १० ॥

उपायास्यति शक्रस्त्वां पाण्डवानां हितेप्सया । ब्राह्मणच्छद्मना कर्ण कुण्डलापजिहीर्षया ॥ ११ ॥ ‘कर्ण! देवराज इन्द्र पाण्डवोंके हितकी इच्छासे तुम्हारे दोनों कुण्डल (और कवच) लेनेके लिये ब्राह्मणका छद्मवेष धारण करके तुम्हारे पास आयेंगे ॥ ११ ॥

विदितं तेन शीलं ते सर्वस्य जगतस्तथा । यथा त्वं भिक्षितः सद्भिर्ददास्येव न याचसे ॥ १२ ॥ ‘तुम्हारी दानशीलताका उन्हें ज्ञान है तथा सम्पूर्ण जगत्को तुम्हारे इस नियमका पता है कि किसी सत्पुरुषके माँगनेपर तुम उसकी अभीष्ट वस्तु देते ही हो, उससे कुछ माँगते नहीं हो ॥ १२ ॥

त्वं हि तात ददास्येव ब्राह्मणेभ्यः प्रयाचितम् । वित्तं यच्चान्यदप्याहुर्न प्रत्याख्यासि कस्यचित् ॥ १३ ॥