महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतः तुम भी उनकी आराधना करके बारंबार मीठे वचन बोलकर देवेश्वर इन्द्रसे किसी अमोघ अस्त्रके लिये प्रार्थना करना ।। १४ ।।
अमोघां देहि मे शक्तिममित्रविनिबर्हिणीम् ।
दास्यामि ते सहस्राक्ष कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।। १५ ।।
तुम उनसे कहना—‘सहस्राक्ष! मैं आपको अपने शरीरका उत्तम कवच और दोनों कुण्डल दे दूँगा, परंतु आप भी मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये, जो शत्रुओंका संहार करनेवाली है’ ।। १५ ।।
इत्येव नियमेन त्वं दद्याः शक्राय कुण्डले ।
तया त्वं कर्ण संग्रामे हनिष्यसि रणे रिपून् ।। १६ ।।
इसी शर्तके साथ तुम इन्द्रको अपने कुण्डल देना। कर्ण! उस शक्तिके द्वारा तुम युद्धमें अपने शत्रुओंको मार डालोगे ।। १६ ।।
नाहत्वा हि महाबाहो शत्रूनेति करं पुनः ।
सा शक्तिर्देवराजस्य शतशोऽथ सहस्रशः ।। १७ ।।
महाबाहो! देवराज इन्द्रकी वह शक्ति युद्धमें सैकड़ों-हजारों शत्रुओंका वध किये बिना पुनः हाथमें लौटकर नहीं आती ।। १७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सहस्रांशुः सहसान्तरधीयत ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर सूर्यदेव सहसा वहीं अन्तर्धान हो गये ।। १७ १/२ ।।
(कर्णस्तु बुबुधे राजन् स्वप्नान्ते प्रवदन्निव ।
प्रतिबुद्धस्तु राधेयः स्वप्नं संचिन्त्य भारत ।।
चकार निश्चयं राजन् शक्त्यर्थं वदतां वरः ।
यदि मामिन्द्र आयाति कुण्डलार्थं परंतपः ।।
शक्त्या तस्मै प्रदास्यामि कुण्डले वर्म चैव ह ।
स कृत्व प्रातरुत्थाय कार्याणि भरतर्षभ ।।
ब्राह्मणान् वाचयित्वाथ यथाकार्यमुपाक्रमत् ।
विधिना राजशार्दूल मुहूर्तमजपत् ततः ।।)
राजन्! स्वप्नके अन्तमें कुछ बोलता हुआ-सा कर्ण जाग उठा। भारत! जगनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ राधानन्दन कर्णने स्वप्नका चिन्तन करके शक्तिके लिये इस प्रकार निश्चय किया, ‘यदि शत्रुओंको संताप देनेवाले इन्द्र कुण्डलके लिये मेरे पास आ रहे हैं तो मैं शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच दूँगा।’ भरतश्रेष्ठ! ऐसा निश्चय करके कर्ण प्रातःकाल उठा